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प्रथम संस्कारण की भूमिका

किसी जाति के जीवन में उसके द्वारा प्रयुक्त का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है । आवश्यकता तथा स्थिति के अनुसार इन प्रयुक्त शब्दों का आगम अथवा लोप तथा वाच्य, लक्ष्य एवं द्योत्य भावों में परिवर्तन होता रहता है । अतएव और सामग्री के अभाव में इन शब्दों के द्वारा किसी जाति के जीवन की भिन्न भिन्न स्थितिययों का इतिहास उपस्थित किया जा सकता है । इसी आधार पर आर्यजाति का प्राचीनतम इतिहास प्रस्तुत किया गया है और ज्यों ज्यों सामग्री उपलब्ध होती जा रही है, त्यों त्यों यह इतिहास ठीक किया जा रहा है । इस अवस्था में यह बात स्पष्ट समझ में आ सकती है कि जातीय जीवन में शब्दों का स्थान कितने सहत्व का है । जातीय साहित्य को रक्षित करने तथा उसके भविष्य की सुचारु और समुज्वल बनाने के अतिरिक्त वह किसी भाषा की संपन्नता या शब्दबहुलता का सूचक और उस भाषा के साहित्य का अध्ययन करनेवालों का सबसे बड़ा सहायक भई होता है । विशेषतः अन्य भाषा भाषियों और विदेशियों के लिये तो उसका और भी अधीक उपयोग होता है । इन सब दृष्टियों से शब्दकोश किसी भाषा के साहित्य की मूल्यवान् संपत्ति और उस भाषा के भंडार का सबसे बड़ा निदर्शक होता है ।

जब अँगरेजों का भारतवर्ष के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित होने लगा, तब नवागंतुक आँगरोजों का इस देश की भाषाएँ जानने की विशेष आवश्यकता पड़ने लगी; और फलतः वे देशभाषाओं के कोश, अपने सुभीते के लिये बनाने लगे । इस प्रकार इस देश में आधुनिक ढंग के और अगारादि क्रम से बननेवाले शब्दकोशों की रचना का सूत्रपात हुआ । कदाचित् देशभाषाओं में से सबसे पहले हिंदी (जिसे उस समय अँगरेज लोग हिंदुस्तानी कहा करते थे) के दो शब्दकोष श्रीयुक्त जे० फर्गुसन नामक एक सज्जन ने प्रस्तुत किए थे, जो रोमन अक्षरों में सन् १७७३ में लंदन में छपे थे । इनमें से एक 'हिंदुस्तानी अँगरेजी' का और दूसरा अँगरेजी हिंदुस्तानी' का था । इसी प्रकार का एक कोश सन् १७९० में मदारस में छापा था जो श्रीयुक्त हेनरी हेरिस के प्रयत्न का फल था । सन १८०८ में जोसफ टेलर और विलियम हंटर के संमिलित उद्योग से कलकत्ते में एक 'हिंदुस्तानी अंगरेजी कोश' प्रकाशित हुआ था । इसके उपरांत १८१० में एडिन्बरा में श्रीयुक्त जे० बी० गिलक्राइस्ट का और सन् १८१७ में लंदन में श्रीयुक्त जे० शेक्सपियर का एक 'अँगरेजी हिंदुस्तानी' और एक 'हिंदूस्तानी अंगरेजी' कोश निकला था, जिसके पीछे से तीन संस्करण हुए थे । इनमें से अंतिम संस्करण बहुत कुछ परिवर्धित था । परंतु ये सभी कोश रोमन अक्षरों में थे और इनका व्यवहार अंगरेज या अँगरेजी पढ़े लिखे लोग ही कर सकते थे । हिंदीभाषा या देवनागरी अक्षरों में जो सबसे पहला कोश प्रकाशित हुआ था, वह पादरी एम. टी. एडम ने तैयार किया था । इसका नाम 'हिंदी कोश' था और यह सन् १८२९ में कलकत्ते से प्रकाशित हुआ था । तब से ऐसे शब्दकोश निरंतर बनने लगे, जिनमें या तो हिंदी शब्दों के अर्थ अँगरेजी में और या अँगरेजी शब्दों के अर्थ हिंदी में होते थे। इन कोशकारों में श्रीयुक्त एमय डब्ल्यू. फैलन का नाम विशेष रूप मे उल्लेख करने योग्य है, क्योंकि इन्होने साधारण बोल चाल के छोटे बड़े कई कोश बनाने के अतिरिक्त, कानून और व्यापार आदि के पारिभाषिक शब्दों के भी कुछ कोश बनाए थे । परंतु इनका जो 'हिंदुस्तानी अँगरेजी कोश' था उसमें यद्यपि अधिकांश शब्द हिंदी के ही थे, फिर भी अरबी फारसी के शब्दों की कमी नहीं थी; और कदाचित् फारसी के अदालती लिपि होने के कारण ही उसमें शब्द फारसी लिपि में, अर्थ अंगरेजी में और उदाहरण रोमन में गिए गए थे । सन् १८८४ में लंदन में श्रीयुक्त जे. टी. प्लाटस का जो कोश छपा, था, वह भी बहुत अच्छा था और उसमें भई हिंदी तथा उर्दू शब्दों के अर्थ अँगरेजी भाषा में दिए गए थे । सन् १८७३ में मु. राधेलालजी का शब्दकोश गया से प्रकाशित हुआ था जिसके लिये सरकार से उन्हें यथेष्ट पुरस्कार भी मिला था । श्रीयुक्त पादरी, जे. डी. बैट ने पहले सन् १८७५ में काशी से एक हिंदी कोश प्रकाशित किया था, जिसमें हिंदी के शब्दों के अर्थ अँगरेजी में दिए गए थे । इसी समय के लगभग काशी से कलकत्ता स्कूल बुक सोसायटी का हिंदी कोश प्रकाशित हुआ था, जिसमें हिंदी के शब्दों के अर्थ हिंदी में ही थे । बेट के कोश के भी पीछे से दो और संशोधित तथा परिवर्धित संस्करण प्रकाशित हुए थे । सन्१८७५ में ही पेरिस में एक कोश का कुछ अंश प्रकाशित हुआ था, जिसमें हिंदी या हिंदुस्तानी शब्दों के अर्थ फ्रांसीसी भाषा में दिए गए थे । सन् १८८० में लखनऊ से सैयद जामिन अली जलाल का 'गुलशने फैज' नामक एक कोश प्रकाशित हुआ था, जो था तो फारसी लिपि में ही, परंतु शब्द उसमें अधिकांश हिंदी के थे । सन् १८८७ में तीन महत्व के कोश प्रकाशित हुए थे, जिनमें सबसे अधिक महत्व का कोश मिरजा शाहजादा कँसरबख्त का बनाया हुआ था । इसका नाम 'कैसर कोश' था और यह इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था (दूसरा कोश श्रीयुक्त मधुसूदन पंजीत का बानाया हुआ था जिसका नाम 'मधुसूदन निघंटु' था और जो लाहौर से प्रकाशित हुआ था । तीसरा कोश श्रीयुक्त मुन्नीलाल का था जो दानापुर में छपा था और जिसमें अँगरेजी शब्दों के अर्थ हिंदी में दिए गए थे । सन् १८८१ और १८९५ के बीच में पादरी टी० केपन के बनाए हुए कई कोश प्रकाशित हुए थे जो प्रायः स्कूलों के बिद्यार्थियों के काम के थे । १८९२ में बाँकीपुर से श्रीयुक्त बाबा बैजूदास का 'विवेक' कोश निकला था । इसके उपरांत 'गौरीनागरी कोश', 'हिंदीकोश', 'मंगलकोश', 'श्रीधरकोश' आदि छोटे छोटे और भी कई कोश निकले थे, जिनमें हिंदी शब्दों के अर्थ हिंदी में ही दिए गए थे । इनके अतिरिक्त कहावतों और मुहावरों आदि के जो कोश निकले थे, वे अलग हैं ।

इस बीसवीं शताब्दी के आरंभ से ही मानों हिंदी के भाग्य ने पलटा खाया और हिंदी का प्रचार धीरे धीरे बढ़ने लगा । उसमें निकलनेवाले सामयिक पत्रों तथा पुस्तकों की संखाया भी बढ़ने लगी और पढ़नेवालों की भी संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होने लगी । तात्पर्य यह कि दिन पर दिन लोग हिंदी साहित्य की ओर प्रवृत्त होने लगे और हिंदी पुस्तकें चाव से पढ़ने लगे । लोगें में प्राचीन काव्यों आदि को
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पढ़ने की उत्कंठा बढ़ने लगी। उस समय हिंदी के हितैषियों की हिंदीभाषा का एक ऐसा वृहत् कोश तैयार करने की आवश्कता जान पड़ने लगी, जिसमें हिंदी के पुराने पद्य और नए गद्य दोनों में व्चवहृत होनेवाले समस्त शब्दों का समावेश हो; क्योंकि ऐसे कोश के बिना आगे चलकर हिंदी के प्रचार में कुछ बाधा पहुँचने की आशंका थी ।

काशी नागरीप्रचारिणी सभा ने जितने बड़े बड़े और उपयोगी काम किए हैं, जिस प्रकार प्रायः उन सबका सूत्रपात या विचार सभा के जन्म के समय, उसके प्रथम वर्ष में हुआ था, उसी प्रकरा हिंदी का बृहत् कोश बनाने का सूत्रपात नहीं तो कम से कम विचार भी उसी प्रथम वर्ष में हुआ था । हिंदी में सर्वागपूर्ण और बृहत् कोश का अभाव सभा के संचालकों को १८९३ ई० में ही खटका था और उन्होंने एक उत्तम कोश बनाने के विचार से आर्थिक सहायता के लिये दरभंगानरेश महाराजा सर लक्ष्मीश्वर सिंह जी से प्रार्थना की थी । महाराजा ने भी शिशु सभा के उददेश्य की सराहना करते हुए १२५) उसकी सहायता के लिये भेजे थे और उसके साथ सहानुभूति प्रकट की थी । इसके अतिरिक्त आपने कोश का कार्य आरंभ करने के लिये भी सभा से कहा था और यह भी आशा दिलाइ थी कि आवश्यकता पड़ने पर वे सभा की और भी आर्थिक सहायता देंगे । इस प्रकार सभा ने नौ सज्जनों की एक उपसमिति इस संबंध में विचार करने के लिये नियुक्त की; पर उपसमिति ने निश्चय किया कि इस कार्य के लिये बड़े बड़े विद्वानों की सहायता की आवश्यकता होगी और इसके लिए कम से म दो वर्ष तक २५०) मासिक का व्यय होगा । सभा ने इस संबंध में फिर श्रीमान् दरभंगानरेश को लिखा था, परंतु अनेक कारणों से उस समय कोश का कार्य आरंभ नहीं हो सका । अतः सभा ने निश्चय किया कि जबतक कोश के लिये यथेष्ट धन एकत्र न हो तथा दूसरे आवश्यक प्रबंध न हो जाँय तबतक उसके लिये आवश्यक सामग्री ही एकत्र गी जाय । तदनुसार उसने सामग्री एकत्र करने का कार्य भई आरंभ कर दिया ।

सन् १९०४ में सभा को पता लगा कि कलकत्ते की हिंदी साहित्य सभा ने हिंदी भाषा का एक बहुत बड़ा कोश बनाना निश्चित किया है और उसने इस संबंध में कुछ कार्य भई आरंभ कर दिया है । सभा का उद्देश्य केवल यही था कि हिंदी में एक बहुत बड़ा कोश तैयार हो जाय, स्वयं उसका श्रेय प्राप्त करने का उसका कोई विचार नहीं था । अतः सभा ने जब देखा कि कलकत्ते की साहित्य सभा कोश बनवाने का प्रयत्न कर रही है, तब उसने बहुत ही प्रसन्नतापूर्वक निश्चय किया कि अपनी सारी संचित सामग्री साहित्य सभा को दे दी जाय और यथासाधाय सब प्रकार से उसकी सहायता की जाय । प्रायः तीन वर्ष तक सभा इसी आसरे में थी कि साहित्य सभा कोश तैयार करे । परंतु कोश तैयार करने का जो यश स्वयं प्राप्त करने की उसकी कोई विशेष इच्छा न थी, विधाता वह यश उसी को देना चाहता था । जब सभा ने देखा कि साहित्यसभा की ओर से कोश की तैयारी का कोई प्रबंध नहीं हो रहा है, तब उसने इस काम को स्वयं अपने ही हाथ में लेना निश्चित किया । जब सभा के संचालकों ने आपस में इस विषय की सब बातें पक्की कर लीं, तब २३ अगस्त, सन् १९०७ को सभा के परम हितैषी और उत्साही सदस्य श्रीयुक्त रेवरेंड ई० ग्रीव्स ने सभा की प्रबंधकारिणी समिति में यह प्रस्ताव उपस्थित किया कि हिंदी के एक बृहत् और सर्वागपूर्ण कोश बनाने का भार सभा अपने ऊपर ले; और साथ ही यह भी बतलाया कि यह कार्य किस प्रणाली से किया जाय । सभा ने मि० ग्रीव्स के प्रस्ताव पर विचार करके इस विषय में उचित परामर्श देने के लिये निम्नलिखित सज्जनों की एक उपसमिति नियत कर दी— रेवरेंड ई० ग्रीव्स,महामहोपाध्याय पंडित मुधाकर द्विवेदी, पंडित रामनारायण मिश्र बी० ए०, बाबू गोविंददास, बाबू इंद्रनारायण सिंह एम० ए०, छोटेलाला, मुंशी संकटाप्रसाद, पंडित माधवप्रसाद पाठक और मैं ।

इस उपसमिति के कई अधिवेशन हुए जिनमें सब बातों पर पुरा विचार किया गया । अंत में ९ नवंबर, १९०७ को इस उपसमिति ने अपनी रिपोर्ट दी, जिसमें सभा को परामर्श दिया गया कि सभा हिंदीभाषा के दो बड़े कोश बनवावे जिनमें से एक में तो हिंदी शब्दों के अर्थ हिंदी में ही रहें और दूसरे में हिंदी शब्दों के अर्थ अँगरेजी में हों । आजकल हिंदी भाषा में गद्य तथा पद्य में जितने शब्द प्रचलित हैं उन सबका इन कोशों में समावेश हो, उनकी व्युत्पत्ति दी जाय और उनके भिन्न भिन्न अर्थ यथासाध्य उदाहरणों सहित दिए जायँ । उपसमिति ने हिंदी भाषा के गद्य तथा पद्य के प्रायः दो सौ अच्छे अच्छे ग्रंथों की एक सूची भी तैयार कर दी थी और कहा था कि इनमें से सब शब्दों का अर्थसहित संग्रह कर लिया जाय; कोश की तैयारी का प्रबंध करने के लिये उसकी एक स्थायी समिति बना दी जाय और कोश के संपादन तथा उसकी छपाई आदि का सब प्रबंध करने के लिये एक संपादक नियुक्त कर दिया जाय ।

समिति ने यह भी निश्चित किया कि कोश के संबंध में आवश्यक प्रबंध करने के लिये महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी, लाला छोटेलाल, रेवरेंड ई० ग्रीव्स, बाबू इंद्रनारायण सिंह एम० ए०, बाबू गोविंददास, पंडित माधवप्रसाद पाठक और पंडित रामनारयण मिश्र बी० ए० की प्रबंधकर्तृ समिति बना दी जाय, और उसके संत्तित्व का भार मुझे दिया जाय । समिति का प्रस्ताव था कि उस प्रबंधकर्तृ समिति को अधिकार दियचा जाय कि वह आवश्यकतानुसार अन्य सज्जनों को भी अपने में संमिलित कर ले । इस कोश के संबंध में प्रबंधकर्तृ समिति को संमति और सहायता देने के लिये एक और बड़ी समिति बनाई जाने की संमति भी दी गई जिसमें हि । के समस्त बड़े बड़े विद्वान् और प्रेमी संमिलित हों । उस समय यह अनुमान किया था कि इस काम में लगभग ३००००) का व्यय होगा जिसके लिये सभा को सरकार तथा राजा महाराजाओं से प्रार्थना करने का परामर्श दिया गया ।

सभा की प्रबंधकारिणी समिति ने उपसमिति की ये बातें मान ली और तदनुसार कार्य भी आरंभ कर दिया । शब्दसंग्रह के लिये, उपसमिति ने जो पुस्तकें बतलाई थीं, उनमें से शब्दसंग्रह का कार्य भी आरंभ हो गया और धन के लिये अपील भी हुई, जिससे पहले ही वर्ष २३३२) के वचन मिले, जिसमें से १९०२) नगद भी सभा को प्राप्त हो गए । इसमें से सबसे पहले १०००) स्वर्गीय माननीय सर सुंदरलाला सी० आई० ई० ने भेजे थे । स्तय तो यह है कि यदि प्रार्थना करते ही उक्त महानुभाव तुरंत १०००) न भेज देते तो सभा का कभी इतना उत्साह न बढ़ता और बहुत संभव था कि कोश का काम और कुछ समय के लिये टल जाता। परंतु सर सुंदरलाल से १०००) पाते ही सभा का उत्साह बहुत अधिक बढ़ गया और उसने और भई तत्परता से कार्य करना आरंभ किया। उसी समय श्रीमान् महाराज ग्वालियर ने भी १०००) देने
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का वचन दिया । इसके अतिरिक्त और भी अनेक छोटी मोटी रकमों के वचन मिले । तात्पर्य यह कि सभा को पूर्ण विश्वास हो गया कि अब़ कोश तैयार हो जायेगा ।

इस कोश के सहायतार्थ सभा को समय समय पर निम्नलिखित गवर्नमेंटों, महाराजों तथा अन्य सज्जनों से सहायता प्राप्त हुई—

संयुक्त प्रदेश की गवर्नमेंट१३०००)
भारत गवर्नमेंट५०००)
मध्यप्रदेश की गवर्नमेंट१०००)
श्रीमान् महाराज साहब नेपाल२०००)
श्रीमान् स्वर्गवासी महाराज साहब रीवाँ१८००)
श्रीमान् महाराज साहब छत्रपुर१५००)
श्रीमान् महाराज साहब बीकानेर१५००)
श्रीमान् महाराजाधिराज बर्दवान१५००)
श्रीमान् महाराज साहब अलवर१०००)
श्रीमान् स्वर्गवासी महाराज साहब ग्वालियर१०००)
श्रीमान् स्वर्गवासी महाराजा साहब काश्मीर१०००)
श्रीमान् महाराज साहब काशी१०००)
डाक्टर सर सुंदरहलाल१०००)
स्वर्गवासी राजा साहब भिनगा१०००)
कुँवर राजेंद्रसिंह१०००)
श्रीमान् महाराज साहब भावनगर५००)
श्रीमान् महाराज साहब इंदौर५००)
श्रीमान् स्वर्गवासी राजा साहब गिद्धौर५००)
डाक्टर सर जार्ज ग्रियर्सन१५०)

इनके अतिरिक्त और बहुत से महानुभावों से १००) अथवा उससे कम की सहायता प्राप्त हुई ।

शब्दसंग्रह करने के लिये जो पुस्तकें चुनी गई थीं, उन पुस्तकों को सभासदों में बाँटकर उनसे शब्दसंग्रह करने का सभा का विचार था । बहुत से उत्साही सभासदों ने पुस्तकें तो मँगवा लीं पर कार्य कुछ भी न किया । बहुतों ने तो महीनों पुस्तकें अपने भी पास रखकर अंत में ज्यों की त्यों लौटा दीं और कुछ लोगों ने पुस्तकें भी हजम कर लीं । थोड़े से लोगों ने शब्दसंग्रह का काम किया था, पर उनमें भी संतोषजनक काम इने गिने सज्जनों का ही था । इसमें व्यर्थ बहुत सा समय नष्ट हो गया, पर धन की यथेष्ट सहायता सभा को मिलती जाती थी, अतः दूसरे वर्ष सभा ने विवश होकर निश्चित किया कि शब्दसंग्रह का काम वेतन देक कुछ लोगो से कराया जाय । तदनुसार प्रायः १९—१७ आदमी शब्दसंग्रह के काम के लिये नियुक्त कर दिए गए और एक निश्चित प्रणाली पर शब्दसंग्रह का काम होने लगा ।

आरंभ में कोश के सहायक संपादक पंडित बालकृष्ण भट्ट, पंडित रामचंद्र शुक्ल, लाला भागवानदीन और बाबू अमीरसिंह के अतिरिक्त बाबू जगन्मोहन वर्मा, बाबू रामचंद्र वर्मा पंडित वासुदेव मिश्र, पंडित रामवचनेश मिश्र, पंडित ब्रजभूषण ओझा, श्रीयुत वेशी कवि आदि अनेक सज्जन भी इस शब्दसंग्रह के काम में संमिलित थे । शब्दसंग्रह के लिये सभा केवल पुस्तकों पर ही निर्भर नहीं रहीं । कोश में पुस्तकों के शब्दों के अतिरिक्त और भी अनेक ऐसे शब्दों की आवश्यकता थी जो नित्य की बोलचाल के, पारिभाषिक अथवा ऐसे विषयों के शब्द थे जिनपर हिंदी में पुस्तकें नहीं थीं । अतः सभा ने मुंशी रामलगनलाल नामक एक सज्जन को शहर में घूम घूमकर अहीरी, कहारीं, लोंहारीं, सोनारों, चमारों, तमोलियों, तेलियों, जोलाहों, भालू और बंदर नचानेवालों, कूचेबंदों, धुनियों, गाड़ीवानों, कुश्तीबाजों, कसेरों, राजगीरों, छापेखानेवालों, महाजनों, बजाजों, दलालों, जुआरियों, महावतों, पंसारियों, साईसों आदि के पारिभाषिक शब्द तथा गहनों, कपड़ों, अनाजों, पेड़ों, बरतनों, देवताओं, गृहस्था की चीजों, पक्वानों, मिठाइयों, विवाह आदि की रस्मों, तकॉरकारियों, सागों, फलों, घासों, खेलों और उनके साधनों, आदि आदि के नाम् एकत्र करने के लिये नियुक्त किया। पुस्तकों के शब्दसंग्रह के साथ साथ यह काम भी प्रायः दो वर्ष तक चलता रहा । इस संबंध में यह कह देना आवश्यक जान पड़ता है कि मुंशी रामलगनलाल का इस संबंध का सभ्दसंग्रह बहुत संतोषजनक था । इसके अतिरिक्त सभा ने बाबू रामचंद्र वर्मा को समस्त भारत के पशुओं, पक्षियों, मछलियों, फूलों और पेड़ों आदि के नाम एकत्र करने के लिये कलकत्ते भेजा था जिन्होंने प्रायः ढाई मास तक वहाँ रहकर इंपीरियल लाइब्रेरी से ' पलोरा और फोंना आफ बृटिश इंडिआ सीरिज' की समस्त पुस्तकों में से नाम और विवरण आदि एकत्र किए थे । हिंदी भाषा में व्यवहृत होनेवाले अंगरेजी, फारसी, अरबी तथा तुर्की आदि भाषाओं के शब्दों, पौराणिक तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों की जीवनियों, प्राचीन स्थानों तथा कहावतों आदजि के संग्रह का भी बहुत अच्छा प्रबंध किया गया था । पुरानी हिंदी तथा डिंगल और बुंदेलखंडी आदि भाषाओं के शब्दों का भी अच्छा संग्रह किया गया था । इसमे सभा का मुख्य उद्देश्य यह था कि जहाँ तक हो सके, कोश में हिंदी भाषा में व्यवहृत होने या हो सकनेवाले अधिक से अधिक शब्द आ जायँ और यथासाध्य कोई आवश्यक बात या शब्द छूटने न पावे । इसी विचार से सभा ने अँगरेजी, फारसी, अरबी और तुर्की आदि भाषाओं के शब्दों, पौराणिक तथा ऐतिहासिक व्यक्तियों और स्थानों के नामों आदि की एक बड़ी सूची भी प्रकाशित कराके घटाने बढ़ाने के लिये हिंदी के बड़े बड़े विद्वानों के पास भेजी थी ।

दो ही वर्ष में सभा को अनेक बड़े बड़े राजा महाराजाओं तथा प्रांतीय और भारतीय सरकारों से कोश के महायतार्थ बड़ी बड़ी रकमें भी मिलीं, जिससे सभा तथा हिंदीप्रेमियों को कोश के तैयार होने में किसी प्रकार का संदेह नहीं रह गया और सभा बड़े उत्साह से कोश का काम कराने लगी। आरंभ में सभा ने यह निश्चित नहीं किया था कि कोश का संपादक कौन बनाया जाय, पर दूसरे वर्ष सभा ने मुझे कोश का प्रधान संपादक बनाना निश्चित किया । मैंने भी सभा की आज्ञा शिरोधार्य करके यह भार अपने ऊपर ले लिया ।

सन्१९१० के आरंभ में शब्दसंग्रह का कार्य समाप्त हो गया । जिन स्लिपों पर शब्द लिखे गए थे, उनकी संख्या अनुमानतः १० लाख थी, जिनमें से आशा की गई थी कि प्रायः १ लाख शब्द निकलेंगे, और प्रायः यही बात अंत में हुई भी । जब शब्दसंग्रह का काम हो चुका, तब स्लिपें अक्षरक्रम से लगाई जाने लगी। पहले वे स्वरों और व्यंजनों के विचार से अलग अलग की गई और तब स्वरों के प्रत्योक अक्षर तथा व्यजनों के प्रत्येक वर्ग की स्लिपें अलग अलग की गई । जब स्वरों की स्लिपें अक्षरक्रम से लग गई, तब व्यंजनों के वर्गों के अक्षर अलग अलग किए गए और प्रत्योक अक्षर की स्लिपें क्रम से लगाई गई । यह कार्य प्रायः एक वर्ष तक चलता रहा ।

जिस समय कोश के संपादन का भार मुझे दिया गया था, उसी
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समय सभा ने यह निश्चित कर दिया था कि पंडित बालकृष्ण भट्ट, पंडित रामचंद्र शुक्ल, लाला भगवानदीन तथा बाबू अमीर सिंह कोश के सहायक संपादक बनाए जायँ और ये लोग कोश के संपादन में मेरी सहायता करें । अक्टूबर, १९०९ में मेरी नियुक्ति काश्मीर राज्य में हो गई जिसके कारण मुझे काशी चोड़कर काश्मीर जाना आवश्यक हुआ । उस समय मैंने सभा से प्रार्थना की कि इतनी दूर से कोश का संपादन सुचारु रूप से न हो सकेगा । अतः सभा मेरे स्थान पर किसी और सज्जन को कोश का संपादक नियुक्त करे । परंतु सभा ने यही निश्चय किया कि कोश का कार्यालय भी मेरे साथ आगे चलकर काश्मीर भेज दिया जाय और वहीं कोश का संपादन हो । उस समय तक स्लिपें अक्षरक्रम से लग चुकी थी और संपादन का कार्य अच्छी तरह आरंभ हो सकता था । अतः १५ मार्च, १९१० को काशी में कोश का कार्यालय बंद कर दिया गया और निश्चय हुआ कि चारों सहायक संपादक जंबू पहुँचकर १ अप्रैल, १९१० से वहीं कोश के संपादन का कार्य आरंभ करें । तदनुसार पंडित रामचंद्र शुक्ल और बाबू आमीर सिंह तो यथासमय जंबू पहुँच गए, पर पंडित बालकृष्ण भट्ट तथा लाला भगवानदीन ने एक एक मास का समय माँगा । दुर्भाग्यवश बाबू अमीर सिंह के जंबू पहुँचने के चार पाँच दिन बाद ही काशी में उनकी स्त्री का देहांत हो गया, जिससे उन्हें थोड़े दिनें के लिये फिर काशी लौट आना पड़ा । उस बीच में अकेले पंडित रामचंद्र शुक्ल ही संपादन कार्य करते रहे । मई के आरंभ में पंडित बालकृष्ण भट्ट और बाबू अमीर सिंह जंबू पहुंचे और संपादनकार्य करने लगे । पर लाला भगावानदीन कई बार प्रतिज्ञा करके भी जंबू न पहुँच सके; अतः सहायक संपादक के पद से उनका संबंध छूट गया । शेष तीनों सहायक संपादक महाशय उत्तमतापूर्वक संपादन कार्य करते रहे । कोश के विषय में संमति लेने के लिये आरंभ में जो कोश कमेटी बनी थी, वह १ मई, १९१० को अनावश्यक समझकर तोड़ दी गई ।

कोश का संपादन आरंभ रो चुका था और शीघ्र ही उसकी छपाई का प्रबंध करना आवश्यक था, अतः सभा ने कई बड़े बड़े प्रेसों से कोश की छपाई के नमूने मँगाए । अंत में प्रयाग के सुप्रसिद्ध इंडियन प्रेस को कोश की छपाई का भार दिया गया । इस कार्य के लिये आरंभिक प्रबंध करने के लिये उक्त प्रेस को २०००) पेशगी दिए गए और लिखापढ़ी करके छपाई के संबंध में सब बातें तै कर ली गई

अप्रैल, १९१० से सितंबर, १८१० तक तो जंबू में कोश के संपादन का कार्य बहुत उत्तमतापूर्वक और निर्विघ्न होता रहा; पर पीछे इसमें एक विघ्न पड़ा । पंडित बालकृष्ण भट्ट जंबू में दूर्घटनावश सीढ़ी पर से गिर पड़े और उनकी एक टाँग टूट गई, जिसके कारण अक्टूबर, १९१० में उन्हें छुटी लेकर प्रयाग चले य़ाना पड़ा । नवंबर में बाबू अमीर सिंह भी बीमार हो जाने के कारण छुट्टी लेकर काशी चले आए और दो मास तक यहीं बीमार पड़े रहे । संपादन कार्य करने के लिये जंबू में फिर अकेले पंडित रामचंद्र शुक्ल बच रहे । जब अनेक प्रयत्न करने पर भी जंबू में सहायक संपादकों का संख्या पुरी न हो सकी, तब विवश होकर १५ दिसंबर, १९१० को कोश का कार्यालय जंबू से काशी भेज दिया गया। कोश विभाग के काशी आ जाने पर जनवरी, १९११ से बाबू अमीर सिंह भी स्वस्थ होकर उसमें संमिलित हो गए और बाबू जगन्मोहन वर्मा भी सहायक संपादक के पदपर नियुक्त कर दिए गए । दूसरे मास फरवरी में बाबू गंगाप्रसाद गुप्त कोश के सहायक संपादक बनाए गए जंबू में तो पहले सब सहायक संपादक अलग अलग सब्दों का संपादन करते थे और तब सब लोग एक साथ मिलकर संपादित शब्दों को दोहराते थे ।परंतु बाबू गंगाप्रसाद कुप्त के आ जाने पर दो दो सहायक संपादक अलग अलग मिलकर संपादन करने लगे । नवंबर, १९११ में जब बाबू गंगाप्रसाद गुप्त ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, तब पंडित बालकृष्ण भट्ट पुनः प्रयाग से बुला लिए गए और जनवरी, १८९२ में लाला भगवानदीन भी पुनः इस विभाग में संमिलित कर लिए गए तथा मार्च, १९१२ से सब सहायक संपादक संपादन के कार्य के लिये तीन भागों में विभ्कत कर दिए गए । इस प्रकार कार्य की गति पहले की अपेक्षा बढ़ तो गई, पर फिर भी उसमें उतनी वृद्धी नहीं हुई जितनी बांछित थी । जब मई, सन् १९१० में 'अ' 'आ' 'इ', और 'ई' का संपादन हो चुका, तब उसकी कापी प्रेस में भेज दी गई और उसकी छपाई में हाथ लगा दिया गया । उस समय तक मैं काश्मीर से लौटकर काशी आ गया था, जिससे कार्यनिरीक्षण और व्यवस्था का अधिक सुभीता हो गया ।

सन् १९१३ में संपादनशैली में कुछ और परिवर्तन किया गया । पंडित बालकृष्ण भट्ट, बाबू जगन्मोहन वर्मा, लाला भगवानदीन तथा बाबू अमीर सिंह अलग अलग संपादन कार्य पर नियुक्त कर दिए गए । सब संपादकों की लेखशैली आदि एक ही प्रकार की नहीं हो सकती थी, अतः सबकी संपादित स्लिपों को दोहराकर एक मेल करने के कार्य पर पंडित रामचंद्र शुक्ल नियुक्त किए गए और उनकी सहायता के लिये बाबू रामचंद्र वर्मा रखे गए । उस समय यह व्ववस्था थी कि दिनभर तो सब सहायक संपादक अलग अलग संपादन कार्य किया करते थे और पंडित रामचंद्र शक्ल पहले की संपादित की हुई स्लिपों को दोहराया करते थे, और संध्या को चार बजे से पाँच बजे तक सब संपादक मिलकर एक साथ बैठते थे और पंडित रामचंद्र शुक्ल की दुहराई हुई स्लिपों को सुनते तथा आवश्यचकता पड़ने पर उसमें परिवर्तन आदि करते थे । इस प्रकार कार्य भी अधिक होता था और प्रत्येक शब्द के संबंध में प्रत्येक सहायक संपादक की संमति भी मिल जाती थी ।

मई, १९१२ में छपाई का कार्य आरंभ हुआ था और एक ही वर्ष के अंदर ९६ —९६ पृष्ठों की चार संख्याएँ छपकर प्रकाशित हो गई, जिनमें ८६६६ शब्द थे । सर्वसाधारण में इन प्रकाशित संख्याओं का बहुत अच्छा आदर हुआ । सर जार्ज ग्रियर्सन, डाक्टर रुडाल्क हार्नली प्रोफेसर सिलवान लेवी, रेवरेंड़ ई० ग्रीव्स, पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंडया, महामहोपाध्याय डाक्टर गंगानाथ झा, पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी, मिस्टर रमेशचंद्र दत्त, पंडित श्यामविहारी मिश्र आदि अनेक बड़े बड़े विद्वानों, पंडितों तथा हिंदीप्रेमियो ने प्रकाशित अंकों की बहुत कुछ प्रशंसा की और अँगरेजी दैनिक लीडर तथा हिंदी साप्ताहिक बगवासी आदि समाचारप्त्रों ने भी समय समय पर अच्छी प्रशंशात्मक आलोचना की । ग्राहकसख्या भी दीन पर दिन बहुत ही संतोषजनक रूप में बढ़ने लगी ।

इस अवसर पर एक बाँत और कह देना आवश्यक जान पड़ता है। जिस समय मैं पहले काश्मीर जाने लगा था, उस समय पहले यही निश्चय हुआ था कि कोशाविभाग काशी में ही रहे और मेरी
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अनुपस्थिति में स्वर्गवासी पंडित केशवदेब शास्त्री कोशविभाग का निरीक्षण करें । परंतु मेरी अनुपस्थिति में पंडित केशवदेव शास्त्री तथा कोश के सहायक संपादकों में कुछ अनबन हो गई, जिसने आगे चलकर और भी विलक्षण रूप धारण किया । उस समय संपादक लोग प्रबंधकारिणी समिति के अनेक सदस्यों तथा कर्मचारियों से बहुत रुष्ट और असंतुष्ट हो गए थे । कई मास तक यह झगड़ा भीषण रूप से चलता रहा और अनेक समाचारपत्रों में उसके संबंध में कड़ी टीप्पणियाँ निकलती रहीं । सभा के कुछ सदस्य तथा बाहरी सज्जन कोश की व्यवस्था और कार्यप्रणाली आदि पर भी अनेक प्रकार के आक्षेप करन लगे, और कुछ सज्जनों ने तो छिपे छिपे ही यहाँ तक उद्योग किया कि अबतक कोश में जो व्यय हुआ है, वह सब सभा को देकर कोश की सारी सामग्री उससे ले ली जाय और स्वतंत्र रूप से उसके संपादन तथा प्रकाशन आदि की व्यवस्था की जाय । यह विचार यहाँ तर पक्का हो गया था कि एक स्वनामधन्य हिंदी विद्वान् से संपादक होने के लिये पत्रव्यवहार तक किया था । साथ ही मुझे उस काम से विरत करने के लिये मुझपर प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न रीति से अनेक प्रकार के अनुचित आक्षेप तथा दोषारोपण किए गए थे । इस आंदोलन में व्यक्तिगत भाव अधिक था । पर थोड़ेही दिनों में यह अप्रिय और हानिकारक आंदोलन ठंढा पड़ गया और फिर सब कार्य सुचारु रूप से पूर्ववत् चलने लगा । 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि' के अनुसार इस बड़े काम में भी समय समय पर अनेक विघ्न उपस्थित हुए पर ईश्वर की कृपा से उनके कारण इस कार्य में कुछ हानि नहीं पुहँची ।

सन् १९१३ में कोश का काम अच्छी तरह चल निकला । वह बराबर नियमित रूप से संपादित होने लगा और संख्याए बराबर छपकर प्रकाशित होने लगी । बीच बीच में आवश्यकतानुसार संपादनकार्य में कुछ परिवर्तन होता रहा । इसी बीच में पंड़ित वालकृष्ण भट्ट, जो इस वृद्धावस्था में भई बड़े उत्साह के साथ कोशसंपादन के कार्य में लगे हुए थे, अपनी दिन पर दिन बढ़ती हुई अशक्तता के कारण अभाग्यवश नवंबर, १९१२ में कोश के कार्य से अलग होकर प्रयाग चले गए और वहीं थोड़े दिनों बाद उनका देहांत हो गया । उस समय बाबू रामचंद्र वर्मा उनके स्थान पर कोश के सहायक बना दिए गए और कार्यक्रम में फिर कुछ परिवर्तन की आवश्यकता पड़ी । निश्चित हुआ कि बाबू जगन्मोहन वर्मा, लाला भगवानदीन तथा बाबू अमीरसिंह आगे के शब्दों का अलग अलग संपादन करें और पंडित रामचंद्र शुक्ल तथा बाबू रामचंद्र वर्मा संपादित किए हुए शब्दों को अलग अलग दोहराकर एक मेल करें । इस क्रम में यह सुभीता हुआ कि आगे का संपादन भी अच्छी तरह होने लगा और संपादित शब्द भी ठीक तरह से दोहराए जाने लगे; और दोनों ही कार्यों की गति में भी यथेष्ट वृद्धि हो गई । इस प्रकार १९१७ तक बराबर काम चलता रहा और कोश की १५ संख्याएं छपकर प्रकाशित हो गई तथा ग्राहकसंख्या में बहुत कुछ वृद्धि हो गई । इस बीच में और कोई उल्लेख योग्य बात नहीं हुई ।

सन् १९१८ के आरंभ में तीन सहायक संपादकों ने 'रा' तक संपादन कर डाला और दो सहाक संपादकों ने 'बि' तक के शब्द दोहरा डाले। उस समय कई महीनों से कोश की बहुत कापी तैयार रहने पर भी अनेक कारणों से उसका कोई अंक छपकर प्रकाशित न हो सका जिसके कारण आय रुकी हुई थी । कोश विभआग का व्यय बहुत अधिक था और कोश के संपादन का कार्य प्रायः समाप्ति पर था अतः कोश विभाग का व्यय कम करने की इच्छा से विचार हुआ कि अप्रैल, १९१८ से कोश का व्यय कुछ घटा दिया जाय । तदनुसार बाबू जगन्मोहन वर्मा, लाला भगवानदीन और बाबू अमीरसिंह त्यागपत्न देक अपने पद से अलग हो गए । कोश विभाग में केवल दो सहायक संपादक — पंडित रामचंद्र शुक्ल और बाबू रामचंद्र वर्मा— तथा स्लिपों का क्रम लगानेवाले और साफ कापी लिखनेवाले एक लेखक पंडित ब्रजभूषण ओझा रह गए । इस समय आगे के शब्दों का संपादन रोक दिया गाय और केवल पुराने संपादित शब्द ही दोहराए जाने लगे । पर जब आगे चलकर दोहराने योग्य स्लिपें प्रायः समाप्त हो चलीं, और आगे नए शब्दों के संपादन की आवश्यकतका प्रतीत हुई तब संपादनकार्य के लिये बाबू कालिकाप्रसाद नियुक्त किए गए जो गई वर्षों तक अच्छा काम करके और अंत में त्यागपत्र देकर अन्यत्र जले गए । परंतु स्लिपों को दोहराने का कार्य पूर्ववत् प्रचलित रहा ।

सन् १९२४ में कोश के संबंध मे एक हानिकारक दुर्घटना हो गई थी । आरंभ में शब्दसंग्रह की जो स्लिपें तैयार हुई थी, उनके २२ बंडल कोश कार्यालय से चोरी चले गए । उनमें 'विव्वोक' से 'शं' तक की और 'शय' से 'सही' तक की स्लिपें थी । इसमें कुछ दोहराई हुई पुरानी स्लिपें भी थी जो छप चुकी थीं । इन स्लिपों के निकल जाने से तो कोई विशेष हानि नहीं हुई, क्योंकि सब छप चुकी थीं । परंतु शब्दसंग्रहवाली स्लिपों के चोरी जाने से अवश्य ही बहुत बड़ी हानि हुई । इसके स्थान पर फिर कोशों आदि से शब्द एकत्र करने पड़े । यह शब्दसंग्रह अपेक्षाकृत थोड़ा और अधूरा हुआ और इसमें स्वभावतः ठेठ हिंदी या कविता आदि के उतने शव्द नहीं आ सके, जितने आने चाहिए थे, और न प्राचीन काव्यग्रंथों आदि के उदाहरण ही संमिलित हुए । फिर भी जहाँ तक हो सका, इस त्रुटि की पूर्ति करने का उद्योग किया गया और परिशिष्ट में बहुत से छूटे हुए शब्द आ भी गए हैं ।

सन् १९२५ में कार्य शीघ्र समाप्त करने के लिये कोश विभाग में दो नए सहायक अस्थायी रूप से नियुक्त किए गए— एक तो कोश के भूतपूर्व संपादक बाबू जगन्मोहन वर्मा के सुपुत्र बाबू सत्यजीवन वर्मा एम० ए० और दूसरे पंडित अयोध्यानाथ शर्मा, एम० ए० । यद्यपि ये सज्जन कोश विभा गमें प्रायः एक ही वर्ष रहे थे, फिर भी इनसे कोश का कार्य शीघ्र समाप्त करने में और विशेषता व, श्, ष, तथा स के शब्दों के संपादन में अच्छी सहायता मिली । जब ये दोनों सज्जन सभा से संबंध त्यागकर चले गए तब संपादन कार्य के लिए श्रीयुत पंडित वासुदेव मिश्र, जो आरंभ में भी कोशविभाग में शब्दसंग्रह का काम कर चुके थे और जो इधर बहुत दिनों तक कलकत्ते के दैनिक भारतमित्र तथा साप्ताहिक श्रीकृष्णसंदेश के संपाद रह चुके थे, कोष विभाग में महायक संपादक के पद पर नियुक्त कर लिए गए । इनकी नियुक्ति से संपादन कार्य बहुत ही सुगम हो गया और वह बहुत शीघ्रता से अग्रसर होने लगा । अंत में इस प्रकार सन् १९२७ में कोश का संपादन आदि समाप्त हुआ ।


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इतने बड़े शब्दकोश में बहुत शब्दों का अनेक कारणों से छूट जाना बहुत ही स्वाभाविक था । एक तो यों ही सब शब्दों का संग्रह करना बड़ा कठिन काम है, जिस पर एक जीवंत भाषा में नए शब्दों का आगम निरंतर होता रहता है । यदि किसी समय समस्त शब्दों का संग्रह किसी उपाय से कर भी लिया जाय और उनके अर्थ आदि भी लिख लिए जाँय, तथापि जबतकत यह संग्रह छपकर प्रकाशित हो सकेगा तबतक और नए शब्द भाषा में संमिलित हो जाँयगे । इस विचार से तो किसी जीवित भाषा का शब्दकोश कभी भी पूर्ण नहीं माना जा सकता । इन कठिनायों के अतिरिक्त यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि हिंदी भाषा के इतने बड़े कोश को तैयार करने का इतना बड़ा आयोजन यह पहला ही हुआ है । अतएव इसमें अनेक त्रुटियों का रह जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है । फिर भी इस कोश की समाप्ति मे प्रायः २० वर्ष लगे । इस बीच में समय समय पर बहुत से ऐसे नए शब्दों का पता लगता था जो शब्दसागर में नहीं मिलते थे । इसके अतिरिक्त देश की राजनीतिक प्रगति आदि के कारण बहुत से नए शब्द भी प्रचलित हो गए थे जो पहले किसी प्रकार संगृहीत ही नहीं हो सकते थे । साथ ही कुछ शब्द ऐसे भी थे जो शब्दसागर में छपर तो गए थे, परंतु उनके कुछ अर्थ पीछे से मालूम हुए थे । अतः यह आवश्यक समझा गया कि इस छूटे हुए या नवप्रचलित शब्दों और छूटे हुए अर्थों का अलग संग्रह करके परिशिष्ट रूप में दे दिया जाय । तदनुसार प्रायः एक वर्ष के परिश्रम में ये शब्द और अर्थ भी प्रस्तुत करके परिशिष्ट रप में दे दिए गए हैं । आजकल समाचारपत्रों आदि या बोलचाल में जो बहुत से रजानीतिक शब्द प्रचलित हो गए हैं, वे भी इसमें दे दिए गए हैं । सारांश यह कि इसके संपादकों ने अपनी ओर से कोई बात इस कोश को सर्वांगपूर्ण बनाने में उठा नहीं रखी है । इसमें जो दोष, अभाव या त्रुटियाँ हैं उनका ज्ञान जितना इसके संपादकों को है उतना कदाचित दूसरे किसी को होना कठिन है, पर ये बातें असाबधानी से अथवा जान बूझकर नहीं होने पाई हैं । अनुभव भी मनुष्य को बहुत कुछ सिखाता है । इसके संपादकों ने भी इस कार्य को करके बहु कुछत सीखा है और वे अपनी कृति के अभावों से पूर्णतया अभिज्ञ हैं ।

कदाचित् यहाँ पर यह कहना अनुचित न होगा कि भारतवर्ष की किसी वर्तमान देशभाषा में उसके एक बृहत कोश के तैयार कराने का इतना बड़ा और व्यवस्थित आयोजन दूसरा अबतक नहीं हुआ है । जिस ढंग पर यह कोश प्रस्तुत करने का विचार किया गया था, उसके लिये बहुत अधिक परिश्रम तथा विचारपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता थी । साथ ही इस बात की भी बहुत बड़ी आवश्यकता थी कि जो सामग्री एकत्र की गई है उसका किस ढंग से उपयोग किया जाय और भिन्न भिन्न भावों के सूचक अर्थ आदि सिक प्रकार दिए जायँ क्योकि अभी तक हिंदी, उर्दू, बँगला, मराठी या गुजराती आदि किसी देशीभाषा में आधुनिक वैज्ञानिक ढंग पर कोई शब्दकोश प्रस्तुत नहीं हुआ था । अबतक जितने कोश बने थे, उन सबमें वह पुराना ढंग काम में लाया गया था और एक शब्द के अनेक पर्याय ही एकत्र करते रख दिए गए थे । किसी शब्द का ठीक ठीक भाव बतलाने का कोई प्रयत्न नहीं किया गया था । परंतु विचारवान् पाठक समझ सकते हैं कि केवल पर्याय से ही किसी शब्द का ठीक ठीक भाव या अभिप्राय समझ में नहीं आ सकता, और कभी कभी तो कोई पर्याय अर्थ के संबंध में जिज्ञासु को भी और भ्रम में डाल देता है । इसी लिये शब्दसागर के संपादकों को एक ऐसे नए क्षेत्र में काम करना पड़ा था जिसमें अभी तक कोई काम हुआ ही नहीं था । वे प्रत्येक शब्द को लेते थे, उसकी व्युत्पत्ति ढूँढ़ते थे; और तब एक या दो वाक्यों में उसका भाग स्पष्ट करते थे; और यदि यह शब्द वस्तुवाचक होता था, तो उस वस्तु का यथासाध्य पूरा पूरा विवरण देते थे; और तब उसके कुछ उपयुक्त पर्याय देते थे । इसके उपरांत उस शब्द से प्रकट होनेवाले अन्यान्य भाव या अर्थ, उत्तरोत्तर विकास के क्रम से, देते थे । उन्हें इस बात का बहुत ध्यान रखना पड़ता था कि एक अर्थ का सूचक पर्याय दूसरे अर्थ के अंतर्गत न चला जाय । जहाँ आवश्यकता होती थी, वहाँ एक ही तरह के अर्थ देनेवाले दो शब्दों का अंतर भी भली भाँति स्पष्ट कर दिया जाता था । उदाहरण के लिये 'टँगना' और 'लटकना' इन दोनों शब्दों को लिजिए । शब्दसागर में इन दोनों के अर्थों का अंतर इस प्रकार स्पष्ट किया गया है— 'टँगना' और 'लटकना' इन दोनों के मूल भाव में अंतर है । 'टँगना ' शब्द में ऊँचे आधार पर टिकने या अड़ने का भाव प्रधान है और 'लटकना' शब्द में ऊपर से नीचे तक फैले रहने या हिलने डोलने का ।

इसी प्रकार दर्शन, ज्योतिषः वैद्यक, वास्तुविद्या आदि अनेक विषयों के पारिभाषिक शब्दों के भी पूरे पूरे विवरण दिए गए हैं । प्राचीन हिंदी काव्यों में मिलनेवालें ऐसे बहुत से शब्द इसमें आए हैं जो पहले कभी किसी कोश में नहीं आए थे । यही कारण है कि हिंदीप्रेमियों तथा पाठकों ने आरंभ में ही इसे एक बहुमूल्य रत्न की भाँति अपनाया और इसका आदर किया । प्राचीन हिंदी काव्यों का पढ़ना और पढ़ाना, एक ऐसे कोश के अभाव में, प्रायः असंभव था । इस कोश ने इसकी पूर्ति करते वह अभाव बिल्कुल दूर कर दिया । पर यहाँ यह भी निवेदन कर देना आवश्यक जान पड़ता है कि अब भी इसमें कुछ शब्द अवश्य इसलिये छूटे हुए होंगे कि हिंदी के अधिकांश छपे हुए काव्यों में न तो पाठ ही शुद्ध मिलता है और न शब्धों के रुप ही शुद्ध मिलते हैं ।

इन सब बातों से पाठकों ने भली भाँति समझ लिया होगा कि इस कोश में जो कुछ प्रयत्न किया गया है, बिल्कुल नए ढंग का है । इस प्रयत्न में इसके संपादकों को कहाँ तक सफलता हुई है । इसका निर्णय विद्वान् पाठक ही कर सकते हैं । परंतु संपादकों के लिये यही बात विशेष संतोष और आनंद की है कि आरंभ से अनेक बड़े बड़े विद्वानों ने जैसे, सर जार्ज ग्रियर्सन, डाक्टर हार्नली, प्री० सिल्वन् लेवी, ड़ा० गंगानाथ झा आदि ने इसकी बहुत अधिक प्रशंसा की है । इसकी उपयोगिता का यह एक बहुत बड़ा प्रमाण है । कदाचित् यहाँ पर यह कह देना भी अनुपयुक्त न होगा कि कुछ लोगों ने किसी किसी जाति अथवा व्यक्तिविष्यक विवरण पर आपत्तियाँ की हैं । मुझे इस संबंध में केवल इतना ही कहना है कि हमारा उद्देश्य किसी जाति को ऊँची या नीची बनाना न रहा है और न हो सकता । इस संबंध में न हम शास्त्रीय व्यवस्था देना चाहते थे और न उसके अधिकारी थे । जो सागमग्री हमको मिल सकी उसके आधार पर हमने विवरण लिखे । उसमें भूल होना या कुछ छूट जाना कोई असंभव बात नहीं है । इसी प्रकार जीवनी के संबंध में मतभेद या भूल हो सकती है । इसके कारण यदि किसी का हृदय दुखा हो या किसी प्रकार का क्षोभ हुआ हो तो उसके लिये हम् दुःखी हैं और क्षमा के प्रार्थी हैं । संशोधित संस्करण में ये त्रुटियाँ दूर की जाय़ँगी ।
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इस प्रकार यह बृहत् आयोजन २० वर्ष के निरंतर उद्योग, परिश्रम और अध्यवसाय के अनंतर समाप्त हुआ है । इससें सब मिलाकर ९३, ११५ शब्दों के अर्थ तथा विवरण दिए गए हैं और आरंभ में हिंदी भाषा और साहित्य के विकास का इतिहास भी दे दिया गया है । इस समस्त कार्य में सभा का अबतक १०, २७, ३५।) ८ १/२ व्यय हुआ है, जिसमें छपाई आदि का भी व्यय संमिलित है । इस कोश की सर्वप्रियता और उपयोगिता का इससे बढ़कर और क्या प्रमाण(यदि किसी प्रमाण की आवश्यकता है) हो सकता है कि कोश समाप्त भी नहीं हुआ और इसके पहले ही इसके खंडों को दो दो और तीन तीन बेर छापना पड़ा है और इस समय इस कोश के समस्त खंड प्राप्य नहीं हैं । इसकी उपयोगिता का दूसरा बड़ा भार प्रमाण यह है कि अभी यह ग्रंथ समाप्त भी नहीं हुआ था, वरन् य़ों कहना चाहिए कि अभी इसका थोड़ा ही अंश छपा था जब कि इससे चोरी करना आरंभ हो गया था और यह काम अबतक चला जा रहा है; पर असल और नकल में जो भेद संसार में होता है वही यहाँ भी दीख पड़ता है । यदि इस संबंध में कुछ कहा जा सकता है तो वह केवल इतना ही है कि इन महाशयों ने चोरी पकड़े जाने के भय से इस कोश कै नाम का उल्लेख करना भी अनुचित समझा है ।

जो कुछ ऊपर लिखा जा चुका है, उसे स्पष्ट है कि इस कोश के कार्य में आरंभ से लेकर अंत तक पंडित रामचंद्र शुक्ल का संबंध रहा है, और उन्होंने इसके लिये जो कुछ किया है, वह विशेष रूप से उल्लिखित होने योग्य है । यदि यह कहा जाय कि शब्दसागर की उपयोगिता और सर्वांगपूर्णता का अधिकांश श्रेय पंडित रामचंद्र सुक्ल को प्राप्त, है, तो इसमें कोई अत्युक्ति न होगी । एक प्रकार से यह उन्हीं के परिश्रम, विद्वत्ता और विचारशीलता का फल है । इतिहास, दर्शन, भाषाविज्ञान, व्याकरण, साहित्य आदि के सभि विषयों का समीचीन विवेचन प्रायः उन्हीं का किया हुआ है । यदि शुक्ल जी सरीखे विद्वान् की सहायता न प्राप्त होती तो केवल एक या दो सहायक संपादकों की सहायता से यह कोश प्रस्तुत करना असंभव ही होता । शब्दो को दोहराकर छपने के योग्य ठीक करने का भार पहले उन्हीं पर था । फिर आगे चलकर थोड़े दिनों बाद उनके सुयोग्य साथी बाबू रामचंद्र वर्मा ने भी इस काम में उनका पूरा पूरा हाथ बँटाया और इसलिये इस कोश को प्रस्तुत करनेवालों में दूसरा मुख्य साथान बाबू रामचंद्र वर्मा को प्राप्त है । कोश के साथ उनका संबंध भी प्रायः आदि से अंत तक रहा है और उनके सहयोग तथा सहायता से कार्य को समाप्त करने में बहुत अधिक सुगमता हुई है । आरंभ में उन्होंने इसके लिये सामग्री आदि एकत्र करने में बहुत अधिक परिश्रम किया था; और तदुपरांत वे इसके निर्माण और संपादित की हुई स्लिपों को दोहराने के काम में पूर्ण अध्यवसाय और शक्ति से संमिलित हुए । उनमें पर्त्यक बात को बहुत शीघ्र समझ लेने की अच्छी शक्ति है, भाषा पर उनका पूरा अधिकार है और वे ठीक तरह से काम करने का ढंग जानते हैं; और उनके इन कुणों से इस कोश को प्रस्तुत करने में बहुत अधिक सहायता मिली है । इसकी छपाई की व्यवस्था और प्रूफ आदि देखने का भार भी प्रायः उन्हीं पर था । इस प्रकार इस विशाल कार्य के संपादन का उन्हें भी पूरा पूरा श्रेय प्राप्त है और इसके लिये मैं उक्त दोनों सज्जनों की शुद्ध हृदय से धन्यवाद देता हूँ । इनके अतिरिक्त स्वर्गीय पंडित वालकृष्ण भट्ट, स्वर्गीय बाबू जगन्मोहन वर्मा, स्वर्गीय बाबू अमीर सिंह तथा लाला भगवानदीन जी को भी मैं बिना धन्यवाद दिए नहीं रह सकता । उन्होने इस कोश के संपादन में बहुत कुछ काम किया है और उनके उद्योग तथा परिश्रम से इस कोश के प्रस्तुत करने में बहुत सहायता मिली है । जिन लोगों ने आरंभ में शब्दसंग्रह आदि या और कामों में किसी प्रकार से मेरी सहायता की है वे भी धन्यवाद के पात्र हैं ।

इनके अतिरिक्त अन्य विद्वानों, सहायकों तथा दानी महानुभावों के प्रति भी मैं अपनी तथा सभा की कृतज्ञता प्रकट करता हूँ जिन्होंने किसी न किसी रूप में इस कार्य को अग्रसर तथा सुसंपन्न करने में सहायता की है, यहाँ तक कि जिन्होंने इसकी त्रुटियों को दिखाया है उनके भी हम कृतज्ञ हैं, क्योकि उनकी कृपा से हमें अधिक संचेत और सावधान होकर काम करना पड़ा है । ईश्वर की परम कृपा है कि अनेक विघ्न बाधाओं के समय समय पर उपस्थित होते हुए भी यह कार्य आज समाप्त हो गया । गदाचित् यह कहना कुछ अत्युक्ति न समझा जायगा कि इसकी समाप्ति पर जितना आनंद और संतोष मुझको हुआ है उतना दूसरे किसी को होना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है । काशी नागरीप्रचारिणी सभा अपने इस उद्योग की सफलता पर अपने को कृतकृत्य मानकर अभिमान कर सकती है ।

काशीश्यामसुंदरदास
३१.१.१९२९प्रधान संपादक
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