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प्रकाशिका

'हिंदी शब्दसागर' अपने प्रकाशन काल से ही कोश के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं के दिशानिर्देशक के रूप में प्रतिष्ठित है । तीन दशकों तक हिंदी की मूर्धन्य प्रतिभाओं ने अपनी सतत तपस्या से इसे सन १९२८ ई० में मूर्त रूप दिया । तबसे निरंतर यह ग्रंथ इस क्षेत्र में गंभीर कार्य करनेवाले विद्वत्समाज में प्रकाशस्तंभ के रूप में मर्यादित हो हिंदी की गौरवगरिमा का आख्यान करता रहा है । अपने प्रकाशन के कुछ समय बाद ही इसके खंड एक एक कर अनुपलब्ध होते गए और अप्राप्त ग्रंथ के रूप में इसका मूल्य लोगों को सहस्त्र मुद्राओं से भी अधिक देना पड़ा । ऐसी स्थिति में अभाव की उपयोगिता द्वारा लाभ उठाने की दृष्टि से अनेक कोशों का प्रकाशन हिंदी जगत् में हुआ, पर वे सारे प्रयत्न इसकी छाया के बल जीवित थे । इसलिये निरंतर इसकी पुनः अवतारणा का गंभीर अनुभव हिंदी जगत् और इसकी जननी नागरीप्रचारिणी सभा करती रही । किंतु साधन के अभाव में अपने इस कर्तव्य के प्रति सजग रहते हुए भी वह अपने इस उत्तरदायित्व का निर्वाह न कर सकने के कारण मर्मातक पीड़ा का अनुभव कर रही थी । दिनोत्तर उसपर उत्तरदायित्व का ऋण चक्रवृद्धि सूद की दर से इसलिये और भी बढ़ता गया कि इस कोश के निर्माण के बाद हिंदी की श्री का विकास बड़े व्यापक पैमाने पर हुआ । साथ ही हिंदी के राष्ट्रभाषा पद पर प्रतिष्ठित होने पर उसकी शब्दसंपदा का कोश भी दिनोत्तर गतिपूर्वक बढ़ते जाने के कारण सभा का यह दायित्व निरंतर गहन होता गया ।

सभा की हीरक जयंती के अवसर पर, २२ फाल्गुन, २०१० वि० को, उसके स्वागनाध्यक्ष के रूप में डाँ० श्री संपूर्णानंद जी ने राषअट्रपति राजेंद्रप्रसाद जी एवं हिंदी जगत् का ध्यान निम्नांकित शब्दों में इस ओर आकृष्ट किया—'हिंदी के राष्ट्रभाषा घोषित हो जाने से सभा का दायित्व बहुत बढ़ गया है । हिंदी में एक अच्छे कोश और व्याकरण की कमी खटकती है । सभा ने आज से कई वर्ष पहले जो हिंदी शब्दसागर प्रकाशित किया था उसका बृहत् संस्करण निकालने की आवश्यकता है । . . . आवश्यकता केवल इस बात की है कि इस काम के लिये पर्याप्त धन व्यय किया जाय और केंद्रीय तथा प्रादेशिक सरकारों का सहारा मिलता रहे ।'

उसी अवसर पर सभा के विभिन्न कार्यों की प्रशंसा करते हुए राष्ट्रपति ने कहा—'वैज्ञानिक तथा पारिभाषिक शब्दकोष सभा का महत्वपूर्ण प्रकाशन है । दूसरा प्रकाशन हिंदी शब्दसागर है जिसके निर्माण में सभा ने लगभग एक लाख रुपया व्यय किया है । . . . आपने शब्दसागर का नया संस्करण निकालने का निश्चिय किया है । जब से पहला संस्करण छपा, हिंदी में बहुत बातों में और हिंदी के अलावा संसार में बहुत बातों में बड़ी प्रगती हुई है । हिंदी भाषा भी इस प्रगति से अपने को वंचित नहीं रख सकती । इसलिये शब्दसागर का रूप भी ऐसा होना चाहिए जो यह प्रगति प्रतिबिंबित कर सके और वैज्ञानिक युग के विद्यार्थियों के लिये भी साधारणतः पर्याप्त हो । मैं आपके निश्चयोंका स्वागत करता हूँ । भारत सरकार की ओर से शब्दसागर का नया संस्करण तैयार करने के सहायतार्थ एक लाख रुपए, जो पाँच वर्षों में बीस- बीस हजार करके दिए जाएँगे, देने का निश्चय हुआ है । मैं आशा करता हूँ कि इस निश्चय से आपका काम कुछ सुगम हो जायगा और आप इस काम में अग्रसर होंगे ।

राष्ट्रपति डाँ० राजेंद्रप्रसाद की इस घोषण ने शब्दशागर के पुनः संपादन के लिये नवीन उत्साह तथा प्रेरणा दी । सभा द्वारा प्रेषित योजना पर केंद्रीय सरकार के शिक्षामंत्रालय ने अपने पत्र सं० एक । ४-३।५४ एच० दिनांक ११।५।५४ को एक लाख रुपया पाँच वर्षों में प्रति वर्ष २०-२० हजार रुपए करके देने स्वीकृति दी ।

इस कार्य की गरिमा को देखते हुए एक परामर्शमंडल का गठन किया गया जिसमें सर्वश्री डा० संपूर्णानंद, ड़ा० सुनीतिकुमार चटर्जी, आचार्य बदरीनाथ वर्मा, राहुल सांकृत्यायन, अमरनाथ झा, शिवपूजन सहाय, मो० सत्यनारायण, रामचंद्र वर्मा, डाँ० वासुदेवशरण अग्रवाल, मुनि जिनविजय, डाँ० तारापोरवाला, डा० सुब्रह्मण्य अय्यर, किशोरीदास वाजपेयी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, आचार्य नरेंद्रदेव, नंददुलारे बाजपेयी, डा० सैयद हफीज, डा० रामअवध द्विवेदी तथा डा० सिद्धेश्वर वर्मा थे । साथ ही, इस सबंध में देश के विभिन्न क्षेत्रों के अधिकारी विद्वानों की भी राय ली गई; किंतु परामर्शमंडल के अनेक सदस्यों का योगदान सभा को प्राप्त न हो सका और जिस विस्तृत पैमाने पर सभा विद्वानों की राय के अनुसार इस कार्य का संयोजन करना चाहती थी, वह भी नहीं उपलब्ध हुआ । फिर भी, देश के अनेक निष्णात अनुभवसिद्ध विद्वानों तथा परामर्शमंडल के सदस्यों ने गंभीरतापूर्वक सभा के अनुरोध पर अपने बहुमूल्य सुझाव प्रस्तुत किए । सभा ने उन सबको गंभीरतापूर्वक मथकर निम्नांकित सिद्धांत शब्दसागर के संपादन हेतु स्थिर किए जिनसे भारत सरकार का शिक्षामंत्रालय भी सहमत हुआ ।

(१) इस कोश में जहाँ आवश्यक हो, वहाँ परिभाषाओं और व्याख्याओं में संगत संशोधन किए जायँ, जिससे यह वैज्ञानिक और वैयुत्पत्तिक कोश हो सके ।

(२) वे शब्द, जो भाषा के अंग बन चुके हैं, चाहे जहाँ से भी आए हों, मूलस्थान का बिना विचार किए रखे जायें । पूर्वसंस्करण में
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गृहीत शब्द निकाले न जायँ, प्रत्युत नए शब्द अथवा यूरोपीय और भारतीय भाषाओं और बोलियों के प्रयोग, जो प्रथम संस्करण के बाद प्रचलन में आए हों, समाविष्ट किए जायँ ।

(३) विभिन्न व्यावसायिक धंधों के जनसाधारण में प्रचलित विशिष्ट शब्दों को ग्रहण किया जाय और यथासंभव उनके उद्गम स्त्रोतों का निर्देश किया जाय ।

(४) जहाँ कहीं आवश्यक और संभव हो, अर्थ को स्पष्ट करने के लिये विशेष विवरण दिए जायँ ।

(५) हिंदी के उन पुराने शब्दों को भी ग्रहण किया जाय जो कभी प्रचलन में थे ।

इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये विभिन्न पुस्तकालयों, कोशशालाओं एवं संदर्भग्रथों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया गया तथा अपने साधन एवं सामर्थ्य की सीमा को परखा गया और शब्दसागर के पुनः संपादन के लिये निम्नांकित तत्वों को आधार कार्य आरंभ किया गया ।

शब्द मुख्य शब्द, उप शब्द, समय पद तीन वर्णों में विभक्त किया गया । मुख्य शब्द के अंतर्गत (क) सभी स्वतंत्र शब्द, मूल या व्युत्पन्न, (ख) वे सभी समस्त पद, जो अर्थगत या इतिहासगत वैशिष्टय के कारण पृथक स्थान के अधिकारी है (जैसे, अन्नपूर्णा, अग्निवर्ण आदि) । उपशब्द के अंतर्गत (क) मुख्य शब्द के विविध और (आब्सोलीट) रूप, बिगड़े या बिगड़े हुए शब्द, संदिग्ध शब्द या कुप्रयुक्त शब्द, और समस्त पद के अंतर्गत वे समस्त शब्द या पद जिनके अर्थों में कोई वैशिष्टय हो, और इनका स्थान मुख्य शब्द के अंतर्गत रहे, अंतर्भूत किए गए । मुख्य शब्द का अर्थ समाप्त होने पर समस्त पद देने की व्यवस्था की गई ।

शब्दसंग्रह में निम्नांकित नियमों का पालन किया गया:

(क) व्यक्तिवाचक और स्थानवाचक संज्ञाओं में से वे ही दिए गए हैं जिनका अर्थसंबंधी ऐतिहासिक महत्व है ।

(ख) क्रियाओं के विभिन्न रूप न देकर केवल धातु रूप दिए गए हैं ।

(ग) ग्रंथों में व्यवहृत शब्दों का ही संग्रग किया गया है, सामान्यतया कोशों से शब्दसंग्रह बहुत कम किया गया हे ।

(घ) संज्ञा के विकारी रूप दिए गए हैं ।

(ङ) रासो, विद्यापति आदि के ग्रंथों में अनेक स्थल ऐसे हैं जहाँ पाठदोष के कारण अर्थनिर्धारण में बाधा पहुँचती है । ऐसे स्थलों में, जहाँ संभव हुआ है, संदिग्ध पाठ के साथ प्रश्नचिह्न देकर नवीन या उचित पाठ का निर्देश कर गया है और यथास्थान अर्थ दे दिया गया है ।

(च) दादू, दरिया आदि के ग्रंथों में फारसी अरबी के शब्दों की बहुतायत है । इनका प्रयोग दो प्रकार से हुआ है—

(१) हिंदी शब्दों के साथ मिश्रित रूप में ।

(२) पूरी पंक्ति या पूरे छंद में अविकल रूप में ।

शब्दसागर में इनमें से प्रथम प्रकार के शब्द ही व्यावहारिक दृष्टि से प्रग्रहीत दिए गए हैं ।

(छ) विदेशी भाषा के उन शब्दों का संकलन भी किया गया है जो हिंदी में प्रर्याप्त प्रचलित हो गए हैं । वर्तनी के संबंध में परिनिष्ठित या मुख्य रूप प्रायः सर्वत्र शब्दसागर में प्रयुक्त किया गया है पर यथावश्यकता जहाँ एक से अधिक वर्तनी प्रचलित हैं, वहाँ अति आवश्यक होने पर उन्हें भी दे दिया है ।

व्याकरणनिर्देश के प्रसंग में शब्दप्रकार या उसका उपभाग दिया गया है, जैसे, उप० (उपसर्ग), सर्व० (सर्वनाम) । शब्दों के अल्पप्रचलित या बहुप्रचलित विशिष्ट अर्थों में वैशिष्टयनिर्देशन के लिये भी व्यवस्था की गई है; जैसे संगीत शास्त्र के लिये (संगीत) और वनस्पतिशास्त्र के लिये (वन०) । प्राचीन शब्दरूपों, मुख्यतया अपभ्रंश में शब्द के पूर्वापर रूपक्रम का उल्लेख है तथा विकारी रूपों, बहुवचन आदि का निर्देश भी किया गया है ।

रूपविज्ञान, जिसके अंतर्गत निरुक्ति या व्युत्पत्ति है बडे कोष्ठ [ ] में देने की व्यवस्था की गई है और जहाँ शब्द की व्युत्पत्ति निश्चित है वहाँ मूल रूप का निर्देश किया गया है । अन्य भाषाओं के रूपांतरित शब्दों के व्युत्पत्तिनिर्देश के संबंध में ध्वनिपरिवर्तन, वर्णलोप, विकार, विरुद्ध अर्थ या भ्रांतिमूलक योजना के आधार पर उसके मूल शब्द का उल्लेख किया गया है ।

इसके साथ ही यह भी उल्लेख कर दिया गया है कि वह संस्कृत के किस शब्द का तत्सम या तद्भव रूप है । यदि वे शब्द फारसी, अरबी, अँगरेजी, फ्रासीसी, पुर्तगाली, चीनी आदि भाषाओं के हैं तो उनका भी तत्सम या तद्भव रूप निर्दिष्ट कर दिया गया है । ऐसे शब्दों के संबंध में, जो रचे या निर्मित किए हुए कोशों से लिए गए हैं, जैसे, ज्योतिर्विज्ञान आदि कोश (नागरीप्रचारिणी सभा), आंग्ल हिंदी महाकोश (डा० रघुवीर), इस्तलाहाते पेशेवाराँ (डा० जफर रहमान) आदि का उल्लेख कर दिया गया है । देशज शब्दों के संबंध में उनके मूल और समस्त पदों का भी निर्देश है ।

यह तो मुख्य शब्दों की बात हुई । उप शब्दों के संबंध में शब्द का विलुप्त यामुख्य रूप उसके विविध रूप प्रस्तुत किए गए हैं । यदि उनके वर्तमान रूपों के कारण उनका प्राचीन रूप अज्ञात या अपरिचित है तो व्याकरणनिर्देश ओर व्युत्पत्ति देने के बाद 'दे०' लिखा गया है । प्रचलित मुख्य शब्द में ऐसे शब्दों का अर्थ देखना चाहिए । जहाँ उप शब्द मुख्य शब्द के अनियमित और विचित्र रूप में ग्रहण किया गया है और यदि अर्थ में परिवर्तन नहीं है तो ऐसे उप शब्दों के लिये भी 'दे०' का ही प्रयोग किया गया है । लेखकों या कोशों के संदिग्ध और अशुद्ध, भ्रांतिमूलक शब्द जिनका क्वचित् प्रयोग ही हुआ हो, उनके अर्थ के लिये भी, 'दे०' देकर मूल शब्द के साथ ही अर्थ देखने की व्यवस्था की गई है ।

समस्त पदों के अंतर्गत सामान्य शब्दों के समस्त रूप यथासंभव गृहीत किए गए हैं । उनमें प्रत्येक शब्द की वर्तनी पृथक् दी गई है, चाहे वे रूप समासचिह्नों अथवा अर्थसंबंधों से संयुक्त हों । अति सामान्य समस्त पद, विशेष आवश्यक न होने पर, नहीं लिए गए हैं ।
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ऐसे समस्त पदों का वर्गीकरण निम्नांकित तीन रूपों में किया जा सकता है :

(क) वे समस्त पद जिनमें प्रत्येक शब्द पूरा पूरा अर्थ निश्चित है ।

(ख) वे जिनमें अर्थगत विशेषता संपृक्त है, पर संयुक्त शब्दों द्बारा जिनकी व्याख्या की जा सकती है ।

(ग) वे समस्त पद, जो अपना प्रशस्त इतिहास होने के कारण विशेष अर्थ के वोधक हो गए हैं और विशेष व्याख्य की अपेक्षा करते हैं । ये सभी समस्त पद मूल शब्द के अंतर्गत अकारादि क्रम से शब्दसागर में प्रस्तुत किए गए हैं ।

मुहाविरों की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार की गई है और उन्हें मूल या प्रधान शब्द के रूप में ग्रहण किया गया है ।

व्युत्पत्तिनिर्देश के संबंध में सामान्यतया जिन सिद्धांतों का परिपालन किया गया है, वे निम्नांकित है:

(क) जो शब्द संस्कृति में उपलब्ध हैं, उनकी व्यत्पत्ति संस्कृत तक ही रखी जाय । सस्कृतेतर शब्दो का मूल स्रोत निर्दिष्ट किया जाय ।

(ख) हिंदी में कहाँ से शब्द आया, इसका उल्लेख हो । यदि वह फारसी आदि से आया हो और फारसी ने संस्कृत आदि से ग्रहण किया हो तो दोनों का उल्लेख हुआ करे । उनकी सीधी व्युत्पत्ति के साथ यह लिखा जाय कि हिंदी में यह शब्द इस अर्थ में सबसे पहले कब से प्रयुक्त हो रहा है ।

(ग) भिन्न स्रोत (मूलधातु) से आए हुए एकार्थवाचक ऐसे शब्दों की व्युत्पत्रि में प्रायः सभी स्रोत दिए जायँ ।

(घ) एक शब्द के कई अर्थ हों उनकी विभिन्न व्युत्पत्तियों की खोज की जाय ।

(ङ) व्युत्पत्ति स्पष्ट करने के लिये अपेक्षित उदाहरण संक्षेप में दिए जायँ ।

(च) शब्दों की व्यत्पत्ति मुख्यतः संस्कृत से दी जाय । शब्दसागर का व्युत्पत्ति भी विचारणीय और परिवर्तनीय मानी गई है और निर्देश के पहले हिंदी या संस्कृत या अन्य का निर्देश किया गया है । उन शब्दों को, जिनकी व्युत्पत्ति अप्राप्त हे और भिन्न उद्गम के हैं, भूखंड़ों के संबंधवशात् देशी निर्दिष्ट किया गया है ।

अप्रचलित और प्राचीन शब्दों के अर्थलेखन में केवल निर्देश करके अर्थ आदि की व्यवस्था की गई है । अर्थों में अनावश्यक विस्तार को रोका गया है और उसकी पुष्टि साहित्य के प्रयोगों से की गई है । ऐसे तद्भव शब्दों का भी निर्देश किया गया है, जिनका अर्थ परिवतित हो गया है । संशोधन के संबंध में यथासाध्य उदाहरण दिया गया है । शब्दों के विविध, नवीन, अर्थ रखे गए है और विभिन्न ग्रंथो से पूरे संकेत के साथ उदाहरण दिए गए है ।

जो अर्थ मूल में अस्पष्ट हैं उन्हें अधिक स्पष्ट किया गया है तथा अर्थ की भाषा सरल रखी गई है । शब्दार्थ मे व्याख्या के साथ अत्यंत आवश्यक होने पर अंगरेजी शब्द भी देवनागरी लिपि में रखे गए हैं । उन शब्दों के उदाहरण यथाशक्ति दे दिए गए हैं जिनके प्रयोग में रूपगत अथवा अर्थगत विशेषता है । मुहावरों के उदाहरण भी, जहाँ आवश्यक हैं, दिए गए हैं । पुरानीं हिंदी के ग्रंथों, यथा रासो आदि से, शब्द और अर्थ के साथ उदाहरण भी दिए गए हैं। सभा के स्वीकृत नियमों के अनुसार मूल विदेशी शब्दों की वर्तनी भी दी गई है और व्युत्पत्ति में शीघ्र उच्चारण सूचित करने के लिये अक्षरों के नीचे बिंदी आदि भी लगाई गई है । जिन ग्रंथों से शब्दचयन किया गया हैं, उदाहरण भी उन्हीं से लिए गए हैं । शब्दसागर के अर्थों के उदाहरण संक्षिप्त किए गए हैं, परंतु ध्यान रखा गया है कि ऐसा करने में संदर्भ की पूर्णता खंडित न होने पाए । प्रसिद्ध एवं प्रचलित शब्दों के नए उदाहरण प्रायः नहीं रखे गए हैं, पर इस बात का ध्यान रखा गया है कि उदाहरण अर्थच्छाया के विशदीकरण के लिये ही हों ।

समितियों और मंडलों द्वारा स्वीकृत इन तत्वों के आधार पर शब्दसागर की रचना हुई । इस कार्य में सभा को ११. वर्ष का समय लगा है तथा सैकड़ों व्यक्तियों ने सहयोग प्रदान किया है । इसकी अपनी एक कहानी है ।

मूल संस्करण की प्रस्तावना भी इस नवीन संस्करण में दे दी गई है जिससे मूल संस्करण का संक्षिप्त इतिहास है । इस नवीन संस्करण का संपादन सरकारी अनुदान पर आधारित था । सरकार के अपने अलग विधि विधान होते हैं और सभा का अपना विधि विधान भी है । इसलिये दोनों के ताल मेल के माध्यम से कार्य का आरंभ और संचालन हुआ । यद्यपि इस कोश के संपादन कार्य को पाँच वर्ष में ही पूरा करना था, तो भी यह कार्य लगभग ११. वर्षों में पूरा हुआ । सभा को इस बात का खेद है कि वह निश्चित समय में कार्य पूरा न कर सकी । किंतु उसे इस बात का संतोष है कि विलंब से ही सही, यह महत्वपूर्ण कार्य संपन्न हुआ । इस कार्य की प्रगति का कुछ विस्तृत विवरण यहाँ उपस्थित करना अप्रासंगिक न होगा ।

१५ जून० १९५४ को कोश कार्य आरंभ हुआ ओर उसके कार्यालय की व्यवस्था की गई । यह कार्य १३ अप्रैल, १९५९ तक चलता रहा इस अवधि के प्रथम वर्ष मूल हिंदी शब्दसागर के ६००० शब्दों पर व्युत्पत्तिसशाधन तथा अपभ्रंश, डिंगल, राजस्थानी, हिंदी आदि के नए पुराने ग्रंथों से ७२, ९०० शब्दों का संकलन किया गया ।

दूसरे वर्ष प्रथम वर्ष के संकलित शब्दको अक्षरक्रम से संयोजित किया गया तथा ३३,३६८ नए संगृहीत शब्दों का अर्थलेखन किया गया । संगृहीत शब्दों में ५,०६८ शब्द अनावश्यक होने के कारण निकाल भी दिए गए और १०,००० शब्दों पर व्युत्पत्तिशाधन का कार्य हुआ । मूल हिंदी शब्दसागर के ६,५११ शब्दों पर व्युत्पत्ति तथा अर्थसंशोधन कार्य भी किया गया । इस वर्ष से विभागीय समस्याओं पर विचारार्थ साप्ताहिक बैठकों की व्यवस्था आरंभ की गई ।

तीसरे वर्ष, अर्थात् संवत् २०१३ विक्रमी में, पुराने संगृहीत शब्दों पर अर्थलेखन कार्य चलना रहा । व्युत्पत्ति के क्षेत्र में १२,०३८ व्युत्पत्तियाँ पूरी की गई । इस अवधि तक पं० करुणापति त्रिपाठी
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संयोजक रहे, फिर अस्वस्थतावश पद से विलग हो गए । श्री कृष्णानंदजी कोश के नए संयोजक हुए । इस वर्ष पंडित विश्वनाथप्रसाद जी मिश्र अवैतनिक रूप से सर्वनिरीक्षक रहे । डा० सुभद्र झा ने भी इस वर्ष एक मास तक अवैतनिक रूप से व्युत्पत्तिकार्य में सहायता पहुँचाई । व्यक्तिगत कारणों से डा० सुभद्र झा और सर्वनिरीक्षक पं० विश्वनाथप्रसाद जी मिश्र सं० २०१३ से अलग हो गए । इस वर्ष आधुनिक साहित्य के विभिन्न ग्रंथों से शब्द संकलित किए गए और उनका अर्थलेखन भी हुआ । प्रथम वर्ष के संगृहीत शब्दों का संनियोजन किया गया जिससे शब्दों के पुनरावृत्त एवं विकारी रूप होने के कारण लगभग चौथाई संकलित शब्द छाँट देने पड़े और उनकी संख्या ५५,३१७ बची ।

चौथे वर्ष अर्थात् संवत् २०१४ में ३,००० और नए शब्दों का संग्रह और अथलेखन किया गया । इस अवधि में २०,००० उदाहरण भी एकत्र किए गए और मूल शब्दसागर के लगभग २५,००० शब्दों पर व्युत्पत्तियाँ संशुद्ध की गई । शब्दसागर के संशोधन एवं संपादन का कार्य भी इस वर्ष आरंभ किया गया । इस वर्ष लगभग ५,००० शब्द तैयार हुए ।

पाँचवें वर्ष मूल हिंदी शव्दसागर के ८,००० और शब्दों की व्युत्पत्तियाँ की गई, और कोश कार्य को अंतिम रूप देने के लिये १३ श्रावण, २०१५ विक्रमी को भाषा और पद्धति संबधी निम्नांकित निश्चय किया गया ।

(१) रचना और व्याकरण की दृष्टि से पश्चिमी हिंदी की खड़ी बोली का क्षेत्र इस कोश के लिये क्षेत्र माना जाएगा । हिंदी की साहीत्यिक परंपरा के अनुसार इनकी उपभाषाओं यथा ब्रज, अवधी, राजस्थानी (डिंगल छोड़कर), और मैथिली के हिंदी साहित्य में स्वीकृत ग्रंथों से शब्द लिए जायँ ।

(२) प्राकृत, अपभ्रंश और डिंगल के शब्द इस कोश में ग्राह्य नहीं हैं ।

(३) अर्थ प्रयोगों के आधार पर ही हों ।

(४) जिन संस्करणों से शब्द लिए गए हैं भविष्य में उन्हीं से लिए जायँ । नए शब्द प्रामाणिक ग्रंथों से लिए जायँ । इनमें सभा के ग्रंथों को वरीयता दी जाय ।

(५) शब्दों में क्रियाओं के धातु रूप दिए जायँ । (उनमें सर्वप्रथम खड़ी बोली की क्रिया का रूप रखा जायगा । उसके अनंतर ब्रज तदनंतर अवधी और राजस्थानी के रूप दिए जायँ । जिन रूपों के उदाहरण न मिले उन्हें छोड़ दें ।)

(६) पुराने अर्थ मुख्यतः प्रयोग के आधार पर रखे जायँ ।

(७) कहावतें, मुहावरे और यौगिक शब्द अलग रखे जायँ ।

(८) इस कोश का विश्वकोशीय अंश हटा दिया जाय ।

(९) अनावश्यक पर्याय न रखे जायँ ।

इस निश्चय के प्रकाश में इस वर्ष के अंत तक कार्य होता रहा । ये निश्चिय मूल निश्चय के अनेक अर्थों में विलोम थे और शब्दगसार की तात्विक गरिमा तथा पूर्वनिश्चयों के अनुकूल भी नहीं थे । योजना की पाँच वर्ष की अवधि तथा निश्चत धन की समाप्ति के कारण किए गए इन निश्चयों के मूल में कार्य की शीघ्र समाप्ति की चिंता ही मानी जा सक्ती है । इस पद्धति पर कार्य किया गया और पुराने किए हुए कार्यों मे लगे श्रम का तात्कालिक लाभ की कामना से एक सीमा तक उत्सर्ग कर दिया गया । प्रचलित खड़ी बोली के शब्दों को इसमें विशेष गरिमा दी गई किंतु पूर्वनिश्चयों में इस महिमा को अक्षुण्ण रखते हुए अतीत की भी संपदा का ध्यान मान रखा गया था जो किसी भी जीवंत भाषा के कोश के लिए परम आवश्वक है । देर से ही सही, बाद में सभा ने उन नए निश्चयों को त्याग भतपूर्व निश्चयों के आधार पर यह कार्य किया है ।

हिंदी शब्दसागर के लिये प्रथम २०,००० का अनुदान ५ अगस्त सन् १९५४ को, दूसरा २०,००० का अनुदान १५ नवबर सन् १९५५ को, तीसरा अनुदान १८ फरवरी सन् १९५७ को और चौथा अनुदान २८ फरवरी सन् १९५८ को प्राप्त हुआ । इन्ही वर्षों मे सभा क्रमश० १६ हजार ५ सौ ७३ रुपए, १९ हजार ३ सो ९ रुपए ७ ।। आने, १५ हजार ६ सौ ५२ रुपए । आने तथा २७ हजार ५ सौ ४६ रुपए ८ १/४ आने व्यय कर चुकी थी; अर्थात् उसे कुल ८० हजार रुपए प्राप्त हुए थे जिसमे ९ सौ १८ रुपए ९७ पैसे मात्र शेष बचे थे । योजवा के पाँचवें वर्ष में सरकार से कोई भी अनुदान प्राप्त नही हुआ । अपितु सभा ने अपने पास से १९ हजार ६ सौ ८१ रुपए ३७ पैसे व्यय किए । संवत् २०१५ में भी इस कार्य पर २० हजार ६ सौ ८ रुपए १४ न० पैसे व्यय हुए । सरकार को २० हजार रुपए सभा को अनुदान स्वरूप दे देना चाहिए था किंतु वह न मिला, कारण चाहे जो भी रहा हो । अंततोगत्वा कोश संपादनकार्य सं० २०१५ के अंत में १३ अप्रैल १९५९ को बंद कर दिया गया ।

अवैतनिक कार्यकर्ताओं के अतिरिक्त वैतनिक कार्य कर्ताओं ने हिंदी शब्दसागर में संमुखांकित पद से अग्रांकित अवधि तक कार्य किया ।

सर्वश्री १० डा० हेमचंद्रजी शी, निरीक्षक संपादक १-११-५४-१३-४-५९, ४ वर्ष ५ ।। माह, २० त्रिलोचन शास्त्री, सहायक संपादक १५-६-५४-१७-१-५६; १५-३-५७-३८४-५९ (स्थानांतरण) ४ वर्ष १ माह, ३. उदयशंकर शास्त्री, सहायक संपादक १५-६-५४-२८-२-५७, २ . वर्ष ८ माह, ४. विश्वनाथ त्रिपाठी, सहायक संपादक, १५-६-५४-१३-४-५९, ५ वर्ष, ५. रामवली पांडेय, लेखक, १६-६-५४-१५-५-५६ (स्थानांतरण), १ वर्ष ११ माह, ६. पूर्णगिरि गोस्वामी उपनिरीक्षक, १५-३-५८-१३-४-५९. १ वर्ष ९ माह; ७. स्व० चंद्रशेखर शुक्ल सहायक संपादक, ७-३-५६-१५३-५८, १५-५-५६-१३-४-५९ (स्थानांतरण), १ वर्ष ३ माह, ८. युगेश्वर पांडेय, लेखक १८-६-५५-१५-३-५८, १५-३-५६-१३-४-५९ (स्थानांतरण) १वर्ष १० माह, ९. बलदेवप्रसाद दत्त, सहायक संपादक, १५-२-५५-१३-४-५९, १ वर्ष २ माह, १०. बसंतूराम यादव, चपरासी, १७-६-५४-१३-४-५९, ५ वर्ष; ११. श्यामनारायण तिवारी, सहायक संपादक, ५-१-५६-१-८-५७, २१-५-५७-१५-४-५८, २ वर्ष; १२. भर्ग्यनाथ दूबे, सहायक संपादक, १५-१-५७-२-८-५७,
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२१-५-५७-१५-४-५८, १ वर्ष; १३. शालग्राम उपाध्याय सहायक संपादक, १५-१-५७-२-८-५७, २१-५-५७-१५-४-५८, १ वर्ष; १४ श्यामसुंदर शुक्ल, सहायक, संपादक, ८-१-५७-२१-५-५७ ४ १/४ मास, १५. हरिमोहन श्रीवास्तव, सहायक संपादक, १५-१-५७-२-८-५७, २१-५-५७-१-१२-५७, ८ माह, १६. बद्रीप्रसाद मिश्र, सहायक संपादक, २८-२-५७-२१-५-५७ ३ माह, १७. लक्ष्मणस्वरूप त्रिपाठी, सहायक संपादक, २८-२-५७-२१-५-५७, ३ मास, १८ रामकुमार राय, सहायक संपादक, २८-२-५७-२१-२-५७, ३ मास, १९. तिलकधारी पांडेय सहायक संपादक, ११-३-५७-२१-५-५७, २ १/२ मास; २०. किशोरीदास वाजपेयी, सहायक संपादक, २४-२-५७-१५-४-५८, १ वर्ष २ मास; २१. दयाशंकर द्विवेदी, सहायक संपादक, ६-३-५७-२१-५-५७, २ १/२ मास; २३. छन्नुराम गुप्त, टंकक, २-८--५७-१६-१०-५७, २ १/२ मास; २४. नागेंद्रनाथ उपाध्याय, सहायक संपादक, १-८-१०-५७-१५-४-५८, ८ १/२ मास, २५. विष्णुचंद्र शर्मा, सहायक संपादक, १-१०-५७-१५-४-५८, ६ १/२ मास; २६. ब्रजेंद्रनाथ पांडेय, सहायक संपादक, १५-११-५७-१५-४-५८, ५ मास; २७. हरिहरसिंह, लेखक, १५-३-५८-१३-४-५९, १ वर्ष, १ मास, २८. जयशंकर मिश्र, टंकक, २-७-५४-१०-२-५५, ७ १/२ मास ।

ता० १३।४।१९५९ को विभाग समाप्त हो गया ।

अपनी अपनी क्षमता और शक्ति के अनुसार इन सभी कार्यकर्ताओं ने कार्य किया, इसके लिये से धन्यवाद के पात्र हैं ।

कोश के कार्य का यह चरण यद्यपि सं० २०१५ में समाप्त हो गया, तो भी धीरे धीरे सभा इस कार्य को अग्रसारित कर रही थी और, कार्य की श्रृंखला बनी रहे, इसलिये स्वयं अपने पास से व्यय कर रही थी । बाकी बचे २० हजार के स्वीकृत अनुदान में से अनेक प्रयत्न करने पर भी १९ जून, १९५९ को केवल १० हजार रुपए केंद्रीय सरकार से प्राप्त हुए । सं० २०१६ मैं सभा वेतन पर १६२६ रुपया ४३ पैसा और व्यय कर चुकी थी तथा कोश के लिये संदर्भ ग्रंथ क्रय करने पर १०१४ रुपया ५६ पैसा लगा चुकी थी । इस प्रकार संवत् २०१६ के अंत तक १२३३० रुपया ३९ पैसा व्यय कर चुकी थी । इसी पीच श्री डा० रामधन शर्मा, बिशेष अधिकारी शिक्षा मंत्रालय द्बारा ३१ जनवरी सन् १९५९ से ४ फरवरी सन् १९५९ तक अब तक किए गए कोश कार्य की जाँच की गई तथा उनका महत्वपूर्ण विवरण प्राप्त हुआ । निष्चय ही इसमें वर्णित तथ्य विचारणीय थे, तथा अनेक सुंदर सुझावों से पूर्ण भी । सभा ने इस पर गंभीरतापूर्वक विचार किया और इस संकल्प पर दृढ़ रही कि उसे शब्दसागर का संशोधन और परिवर्धन करना है और इस रूप में करना है कि भले ही वह संसार का सर्वोत्तम कोश न बन सके तो भी हिंदी के सर्वोत्तम कोश की उसकी मर्यादा सुरक्षित रहे और तब तक के कोश-रचना-शिल्प से आधार पर शेष कार्य को उसको मूल सिद्धांनों के आधार पर अग्रसारित किया जाय । इसी प्रकार वह शब्दसागर की पुरानी मर्यादा का संरक्षम कर सकेगी ।

सरकार ने सभा की इस चिंता में हाथ बटाया और सहानुभूति- पूर्क सहायता के लिये वह पुनः आगे बढ़ी । वह १४ फरवरी सन् १९६२ तक का समय इसमें बीत गया, उसने १०००० रुपए सभा को अनुदानस्वरूप प्रदान किया । इस प्रकार १४ फरवरी सन् १९६२ तक सरकार ने अपना पूर्वस्वीकृत एक लाख रुपया का अनुदान सभा को दे दिया ।

संवत् २०१८ के अंत तक इतश्ततः जो कार्य इस संबंध में सभा कर रही थी उसमें एक लाख के अतिरिक्त ९५७३ रुपया ७३ पैसा सभा और थ्यय कर चुकी थी । तब तक सरकार इस कार्य की गुरुता को पहचान चुकी थी और उसे अधूरा छोड़ना उचित न समझ कर उसने ६५००० का नया अनुदान स्वीकार किया और ४ मार्च सन् १९६३ को उसने उसमें से ३२५०० रुपए सभा को एतदर्थ सहायता की । यही से सभा में कार्य की पुनः नई चेतना उत्पन्न हुई ।

फिर से पुराने कार्य का पुनवरावलोकन और पुनर्मूल्यांकन आरंभ किया गया और पुराने काम को, जिसमें से बहुत अस्तव्यस्त और जीर्ण सा हो गया था, सुव्यवस्थित और सुनियोजित करने में लगभग दो वर्ष व्यतीत हो गए थे । सभा ने यह बड़ा मूल्यवान् समय केवल पुनर्मूल्यांकन में तथा योजनाबद्ध रूप से कार्य करने की योजना बनाने में व्यय किया । फिर भी जिस उत्साह, निष्ठा और लगन से यह कार्य संवत् २०२१ से आरंभ किया गया उसकी गति निश्चय ही संतोषप्रद रही है । निश्चित अवधि के भीतर अब संपादन का कार्य ३१ दिसंबर, सन् ६५ तक समाप्त होने जा रहा है । नई कार्यविधि में शब्दसागर के आरंभ के अंश से ही संकलन, संशोधन, संपादन के साथ ही साथ निरीक्षण, व्यृत्पत्तिनिर्देशन, अर्थचिंतन, संशोधन तथा प्रेस कापी तैयार करने का कार्य वैतनिक अवैतनिक, दोनों प्रकार के कार्यकर्ता अधिकारी और कर्मचारी का भेद भूलकर एकरस हो हिंदी हितचिंचन को आदर्श मान प्राणपण से सचेष्ट होकर इस अवधि में कार्य करते रहे । जिन वैतनिक कार्यकर्ताओं ने कार्य किया है या कर रहे हैं उनकी सूची, पद तथा कार्यावधि के साथ नीचे दी जा रही है ।

१. श्रीत्रिलोचन शास्त्री, सहयक संपादक १-११-५९-३१-१२-६५, ६ वर्ष २ माह; २. श्रीविश्वनाथ त्रिपाठी, सहायक संपादक १-११-५९-१-१-६४, २-५-६०-३१-१२-६५ (स्थानांतरण) २ वर्ष ७ मास; ३. श्रीहरिहर सिंह शास्त्री, सहायक संपादक १४-२-६४-१५-४-६५, १ वर्ष १ ।। मास; ४. स्व० श्रीरघुनंदप्रसाद शुक्ल 'अटल', सहायक संपादक, १-२-६४-३०-९-६५, १ वर्ष ८ मास; ५. श्री लालधर त्रिपाठी प्रवासी; सहायक संपादक, २३-९-६४-३१-१२-६५, १ वर्ष ३ मास; ६. श्रीप्रसाद, सहायक संपादक, २३-९-६४-३१-१२-६५, १ वर्ष ३ मास; ७. श्रीराधाविनोद गोस्वामी, सहायक संपादक, १५-९-६४-३१-१२-६५, १ वर्ष ३ ।। मास; ८. श्रीशारदाशंकर द्विवेदी, सहायक संपादक, ९-३-६५-३१-१२-६५, ९ मास; ९, श्रीराजाराम त्रिपाठी, सहायक संपादक, २७-७-६५-१९-११-६५, ३ ।। मास १०. श्रीरामबली पांडेय, सहायक संपादक, ७-७-६४-३०-१-६५, ६ मास; ११. श्रीविजयबली मिश्र, लेखक, ४-२-६३-३१-१२-६५, २ वर्ष ११ मास; १२. श्रीरामेश्वरलाल लेखक, १५-६-६४-१२-८-६४, २ मास; १३. श्रीकेशरीनारायणत्रिपाठी, लेखक १०-१०-६४-३१-१२-६५,
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१ वर्ष ३ मास; १४.श्रीजितेद्रनाथ मिक्ष, लेखक, १० १०-६४-३१-१२-६५, १.बर्ष ३ मास; २५. श्रीराम मेहरात्ना, लेखक ११-१०-६४-३०-९-६५, १ वर्ष; १६, रामदयाल कश्यप, लेखक , ५-१-६५-३१-१२-६५, १ वर्ष; १७. लज्जाशंकर लाल, लेखक १६-३-६५-३१-१२-६५ ९।। मास; १८., श्रीमनोरंजन ज्योतिषी, लेखक, २३-४-६५-२०-७-६५-३।।मास; १९. श्रीगुबाबलाल श्रीवास्तव , लेखक, १०-५-६५-३१-१२-६५ ७।। मास; २०. श्रीवशिष्टनारायण त्निपाठी, लेखक,१-६-६५-३०-६-६५ १ मास; २३. श्रीउदशंकर दुबे, लेखक, २०-७-६५-३१-१२-६५-५ । मास; २४. श्रीकिशोरीरमण मिश्र, लेखक, १-६-६५-३१-१२-६५-७ । मास; २५. श्री अशर्फीराम मिश्र लेखक, १८-९-६५-३१-१२-६५-३ । मास २६. श्रीश्य़ामाकांत पाठक, लेखक, १८-९-६५-३१-१२-६५. ३ । मास,; २७. श्रीसदानंद शास्त्री लेखक, १८-९-६५-३१-१२-६५-३ ।। मास; २८. श्रीबद्रीनारायण उपाध्याय, लेखक, ११-११-६५-३१-१२-६५-२ मास । चपरासी- स्व राम सुंदर १-११-५९ से; रधुनाथ ८-८-६४-३१-१२. ६५. १।। वर्ष । बुद्धु राम (लगभग २ मास) । ३१-१२-१९६५ की विभाहगसमाप्ति ।

यद्दापि इन वैतनिक कार्यकर्ताओँ की योग्यता और क्षमता के अनुसार उन्हें वृत्ति नहीं दी जा सकी है तो भी अपनी क्षमता भर उन्होंने अपने घर की तरह जिस भाँति दत्तचित्त् होकर कार्य किया है उसके प्रति कृतज्ञता न प्रकाश करना कृतध्नता होगी । हमें इस बात का खेद है कि हम अपनी साधनहीनतावश हिंदी की सेवा सभा के माध्यम से उनसे आगे ले सकने की स्थिति में नहीं हैं । तो भी सभा के प्रत्येक पदाधिकारी की मंगलकामना उनके साथ है ।

संवत् २०१९ में ३२,५००) के प्राप्त अनुदान में से जो व्यय किया गया उसके उपरांत भी २०,६४३)३३ और सं० २०२० में उसी मे से व्यय करने के उपरांत १६, १२९) ८९ पैसे सरकारी अनुदान का बचा रहा । संवत् २०२१ में हिंदी शब्दसागर पर सभा ने जो व्यय किया वह अनुदान से प्राप्त रुपये के अतिरिक्त ५,६३१)७७ था । १५. दिसंबर सन् १९६५ तक सभा अपने पास से ३०,६७१)६१ व्यय कर चुकी थी और इसके अतिरिक्त ३१ दिसंबर तक १, ८२८, रूपया और व्यय होने का अनुमान है । इधर सरकार ने स्वीकृत अनुदान शेष ३२, ५००) में सें १०,०००) भेजा है । इस प्रकार सरकार से स्वीकृत ६५,०००) के इस इनुदान से शब्दसागर का संपादन कार्य समाप्त हो जायगा । केवल 'स' और 'ह' अक्षरों की प्रतिलिपि मात्र शोष रह जायगी ।

इस अवसर पर सभा के भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्री ड़ा० राजबली पाड़ेय और ड़ा० जगन्नाथप्रसाद शर्मा को भी धन्यवाद देते है, क्योंकि उनका प्रयन्त भी स्मरणीय है । कोश कार्य़ का पर्यालोचन तथा निरिश्रण यथावश्यकता बराबर श्रीकृष्णदेवप्रसाद गौड़, प०, शिवप्रसाद मिश्र ''रुद्रा', ड़ा० भोलाशंकर व्यास और मै करता रहा हूँ, और पंड़ित करुणापति त्रिपाठी संयोजक के रूप में गंभीरता और गुरूतापूर्वक अपने इस उत्तरदायित्व का वहन । एक साथ बैठकर सभा के अतिथि भवन के कक्ष में कोश के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साथ हम सबने एक एक शब्द पर चिंतन एवं मनन तो किया ही है, अनेक उलभनों को यथाशक्ति सुलझाते भी रहे है । इस कार्य के लिये हम सबने सभा की सेवा में अपने को अर्पित कर बल भर कार्य पूरा करने का यत्न किया है । इस प्रसंग में संपादकमंड़ल में सरकार के शिक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधि ड़ा० रामधन शर्मा का मार्मिक सहयोग एवं सुझाव वहुत अधिक सहायक हुआ है । अवसर पर सभा के भूतपूर्व सभापति स्वर्गिय आचार्य नरेद्रदेव ,ड़ा० अमरनाथ झा एवं पं० गोबिंद वल्लभ पंत की स्मृति भी जाग्रत हो उठती है । जिन्होने शब्दसागर के नवीन संस्करण के प्रति उनकी चिंता देखी है वे ही अनुमान लगा सकते है कि आज इस कार्य से कितने तुष्ट होते । सभा के संरक्षक तथा राष्ट्रपति स्वर्गीय ड़ा० रार्जेद्रप्रसाद इस कार्य के लिये कितने व्यग्र थे, यह ऊपर दिए गए उसके भाषण के अंश से सहज ही जाना जा सकता है । उनका सभा पर ऋण है और वह ऋण हिंदी के हित में किए गए ऐसे कार्या द्बारा ही चुकाया जा सकता है ।

सभा के संरक्षक ड़ा० संपूर्णनिंद जी उसकी प्रत्येक सुंदर कार्य़ के मूल में आत्मा की भाति है, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का साहस नहीं है । हमारी वर्तमान सभापति पं० कमलापति त्रिपाठी का स्नेह और उदबोधन ही सभा की आज की गति के मूल में है । य़द्यापि देश और समाज के कार्य में वे व्यस्त रहते है, तो भी सभा की चिंता उन्हें बनी रहती है, और राजनीतिक हानि उठाकर भी सभा के प्रत्येक कार्य मे रूचि लेते है। इस कोश के कार्य में उन्होंने जो रूचि ली और जो योग दिया है उसकी प्रेरणा के परिणामस्वरूप ही इस कार्य का संपन्न होना संभव हुआ है ।

भारत के प्रधान मंत्री माननीय श्री लालबहादुर जी शास्त्री का सभा से संबंध बड़ा पुराना है । वे सदैव अपनी व्यस्तता में भी सभा को उन्नत करने में योगदान करते रहते हैँ । इस सभा के वे संरक्षक है, और उन्होंने शब्दसागर के प्रथम खंड़ का उदघटन करने की स्वीकृति देकर हमें जो प्रोत्साहन दिया है, सभा निश्चय़ ही उसके प्रति हृदय़ से कृतज्ञ है और उसके कार्यकर्ता और अधिक उत्साह से हिदी की सेवा करने के लिये कृतसंकल्प ।

भारत सरकार के भूतपूर्व शिक्षामंत्री श्री के० एल० श्रीमाली और वर्तमान उपशीक्षामंक्षी श्री भक्तदर्शन जो ने समय समय पर इस कार्य में जो रुचि दिखाई है, और सभा की जैसी सहायता की है उसके प्रति सभा और उसके कार्यकर्ता हृदय से कृतक्ष हैं ।

हो सकता है इस कार्य के संपन्न होने में कभी कुछ अप्रिय भी हुआ हो । इस अप्रियता का कारण स्वप्न में भी किसी को कष्ट पहुँचाना नहीं रहां है, अपितु कार्य की त्वरित गति और निश्चित अवधि तक समाप्ति को भावना ही हमारे प्रत्येक कार्य़ के मूल में थी । फिर भी यदी इस संबंध में कहीं कुछ अप्रिय हुआ तो उसका उत्तरादयित्व सहुज
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ही मेरे मित्रों पर, विशेषकर मुझ पर, ही है । मैं उसके लिये उन सबसे हृदय से श्रमाप्रार्थी हूँ जिनको जरा भी मुझसे ठेस पहुँची हो ।

इस कोश के नवीन संस्करण के लिये जिन संदर्भ ग्रंथों से सहायता ली गई है उनके लेखकों, संपादकों तथा प्रकाशकों तथा प्रकाशकों के प्रति सभा कृतज्ञ है । इन ग्रंथों में से कुछ विशेष सहायक ग्रंथों के नाम यहाँ दिए जा रहे हैं :

आँक्सफोर्ड डिक्शनरी (१३ खंड) । शार्टर आक्शफोर्ड डिक्शनरी (२ खंड) । कन्साइज आक्सफोर्ड डिक्शनरी । थार्नडाइक इंग्लिश डिक्शनरी । चेंबर्स ट्वेटिएथ सेंचुरी डिक्शनरी । संस्कृत वोर्टेरबुख, आटो बोथलिंग रुडोल्क राथ । संस्कृत इंग्लश डिक्शनरी : सर एम० मोनियर विलियम्स, प्रैक्टिकल संस्कृत इंग्लिश डिक्शनरी : वी० एम० आप्टे । आप्टे कृत प्रैक्टिकल संस्कृत इंग्लिश डिक्शनरी (३ खंड), संपादक—पी० के० गोडे तथा सी० जी० कर्वे । मैकडानेल प्रैक्टिकल संस्कृत इंग्लिश डिक्शनरी । पर्शियन इग्लिश डिक्शनरी : स्टाइनगास । ऐग्लो हिंदुस्तानी डिक्शनरी : फैलन । हिंदुस्तानी प्रोवर्ब्म : फऐलन । नेपाली डिक्शनरी : टर्नर । शब्दार्थ कल्पतरु : मामिडि वेंकटार्य । अल्फरायद उल् दुर्रियत उल—तुलाब (अरबी अंग्रेजी डिक्शनरी) , फरहंग आसफिया (४ खंड) । नूर उल् लुगात (४ खंड)। करीम उल् लुगात । तखमीस उल् लुगात । लुगात किशोरी । अमरकोश । हलायुधकोश । मेदिनी कोश । शब्दकल्पद्रुम (५ खंड) । वाचस्पत्यम (८ खंड) । पूर्णाचंद्र ओड़िया महाकोश (७ खंड) । वाङगला भाषार अभिधान : ज्ञानेंद्रमोहन दास (२ भाग) । चलंतिका : राजशेखर वसु । विनीत जोडणीं कोश : (गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद), मराठी व्युत्पत्ति कोश : कृष्णाजी पांडुजी कुलकर्णी । इस्तेलहाते पेशेवाराँ (आठ खंड) । राजस्थानी सबद कोश : सीताराम लालस । अवधी कोश : रामाज्ञा द्विवेदी 'समीर' । बिहार पीजेटस लाइफ, कृषिकोश : विहार राष्ट्रभाषा परिषद् । कृषि जीवन संबंधी ब्रजभाषा शब्दवली (२ खंड), अंबाप्रसाद सुमन । ब्रजभाषा सूरकोश (पाँच खंड) । तुलसी शब्दसागर: हरगोविंद तिवारी । मानस शब्दसागर : बद्रीदास अग्रवाल । संस्कृत इंग्लिश डिक्शनरी : डॉ० विलसन । अंग्रेजी संस्कृत डिक्शनरी : सर एम० मोनियर विलियम्स । संस्कृत : थियोडोर बेन्फे । पाली इंग्लिश डिक्शनरी : सोसायटी । अर्धमागधी कोश : मुनि श्री रत्नचंद्र । जॉन शेक्सपियर हिंदुस्तानी इंग्लिश डिक्शनरी ऐंड इंग्लिश हिंदुस्तानी डिक्सनरी । प्रसाद काव्यकोश : श्री सुधाकर पांडेय । बृहत् अंग्रेजी हिंदी कोश : ज्ञानमंडल । उर्दू हिंदी शब्दकोश : मद्दाह । पाइय सद्द महण्णवो : हरगोविंद सेठ । अभिधान राजेंद्र (५ खंड) । पाली हाइब्रिड डिक्शनरी । रूपनिघंटु, नागरीप्रचारिणी सभा, वाराणसी । शालिग्राम निघंटुभूषणम् । अश्ववैद्यक । अश्वशास्त्र । रंगीनामा । डिंगल कोश । इन्साक्लोपीडिया आव् रिलीजन ऐंड एथिक्स—हेस्टिंग्ज । विश्वकोश (हिंदी तथा बँगला) संपादक—नगेंद्रनाथ बसु । तिलुगु डिक्शनरी : गैलेटी । पोर्चुगीज ऐंड इंग्लिश डिक्शनरी (२ खंड) । इन्फ्लुएंस आव पोर्चुगीज वोकेवुल्स इन एशियाटिक लांगुवेज : वी० भट्टाचार्य । पर्शियन वोकेबुलरी : लेबर्टन । वर्ल्ड गजेटियर ऐंड जियोग्रैफिकल डिक्शनरी । डिक्शनरी आव् वर्ल्ड लिटरेरी टर्म्स : टी० शिप्ले । लटाइनिशेज एटिमोलोगाशेज वोर्टेरबुख रिलींफ उंट इन्सख्रिप्ट (२ खंड) । मुंडारी इंग्लिश डिक्शनरी । ऐटिमालागिशेल वोर्टेरबुख डेस आल्टिंडिशेन : मानफ्रेड मायर होफऱ (६ खंड) । आल्टिंडिशे ग्रामाटीक (५ खंड), वाकरनागेल । गुरु- शब्दरत्नाकर (४ खंड) । हिंदी राष्ट्रभाषा कोश । वैद्यक शब्दसिंधु । आयुर्वेदीय विश्वकोश (३ खंड) । वनौषधि चंद्रोदय (८ खंड) । इन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (३४-३५) ।

नागरीप्रचारिणी सभा के प्रकाशन तथा कोश विभाग में पूर्ण सहयोग के कारण ही यह कोश इतने शीघ्र प्रकाशित हो सका है और विश्वास है कि शेष खंड प्रत्येक छह छह महीने पर प्रकाशित होते रहेंगे । सभा के सहायकमंत्री श्री शंभुनाथ वाजपेयी, श्री विश्वनाथ त्रिपाठी तथा श्री वल्लभाशरण पांडेय ने प्रूफ संशोधन के कार्य में जो सहयोग दिया है मैं तदर्थ आभारी हूँ । हमने इस बात का प्रयत्न किया है कि प्रूफ संबंधी तथा अन्य त्रुटियाँ इसमें स्थान न पा सकें किंतु कहीं संभव है कुछ प्रूफ संबंधी भूलें आ गई हों जिसका हमें आंतरिक क्लेश है । हम इसे अगले संस्करण में दूर करने का प्रयत्न करेंगे और ध्यान रखेंगे कि इस प्रकार की त्रुटियाँ भविष्य में न हों । फिर भी नागरीमुद्रण के व्यवस्थापक श्री विष्णुचंद्र शर्मा तथा उनके सहयोगियों ने जिस तत्परता के साथ काम किया है वह सराहनीय है ।

इस ग्रंथ के संपादन का ही नहीं, उसके प्रकाशन के व्ययभार का ६० प्रतिशत बोझ भारत सरकार ने वहन किया है । इसलिये ही यह ग्रंथ इतना सस्ता निकालना संभव हो सका है । उसके लिये शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का प्रशंसनीय सहयोग हमें प्राप्त है उसके लिये हम उनके आभारी भी हैं ।

जिस रूप में यह ग्रंथ हिंदी जगत् के संमुख प्रस्तुत किया जा रहा है, उसमें अद्यतन विकसित कोशशिल्प का यथासामर्थ्य उपयोग और प्रयोग किया गया है किंतु हिंदी की और हमारी सीमा है । यद्यपि हम अर्थ और व्युत्पत्ति का ऐतिहासिक क्रमविकास भी प्रस्तुत करना चाहते था, परंतु साधन की कमी तथा हिंदी के ग्रंथों के कालक्रम के प्रामाणिक निर्धारण के अभाव में वैसा कर सकता संभव न था । फिर भी यह कहने में हमें संकोच नहीं कि अद्यतन प्रकाशित कोशों में शब्दसागर की गरिमा आधुनिक भारतीय भाषाओं के कोशों में अतुलनीय है, और इस क्षेत्र में काम करनेवाले इससे आधार ग्रहण करते रहेंगे । इस अवसर पर हिंदी जगत् को यह भी नम्रतापूर्वक सूचित करना चाहते हैं कि सभा ने शब्दसागर के लिये एक स्थाई विभाग का संक्लप किया है जो बराबर इसके प्रर्धन और संशोधन के लिये अद्यतन कोशशिल्प विधि से यत्नशील रहेगा ।

मूल शब्दसागर से इसकी शब्दसंख्या में दुगुनी से अधिक की वृद्धि हुई है और नए शब्द हिंदी साहित्य के आदिकाल, संत एवं सूफी साहित्य (पूर्व मध्यकाल), आधुनिक काल, काव्य, नाटक आलोचना, उपन्यास आदि के ग्रंथ, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाज शास्त्र, वाणिज्य आदि और अभिनंदन एवं पुरस्कृत ग्रंथ, विज्ञान के सामान्य प्रचलित शब्द और राजस्थानी तथा डिंगल, दक्खिनी हिंदी और प्रचलित
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उर्दू शैली आदि से संकलित किए गए हैं । परिशिष्ट खंड में प्राविधिक एवं वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दों की व्यवस्था की गई है ।

शषब्दचयन सामान्यतः सन् १९५६ तक प्रकाशित ग्रंथों से तथा सन् १९६० तक प्रकाशित महत्वपूर्ण ग्रंथों से किया गया है, उनके प्रयोग के उदाहरण भी प्रस्तुत किए गए हैं । शब्दसागर में दी गई ब्युत्पत्तियों या अर्थो तथा दृष्टांतों में व्यापक रूप से संशोधन भी किया गया है, तथा उसमें एतत्संबंधी लगे प्रश्नचिह्नों का यथासाध्य समाधानपूर्वक प्रामाणिक परिष्कार भी किया गया है ।

अंत में शब्दसागर के मूल संपादक तथा सभा के संस्थापक डा. श्यामसुंदरदास को अपना प्रणाम निवेदित करते हुए, यह सकल्प हम पुनः दुहराते है कि जब तक हिंदी रहेगी तब तक सभा रहेगी और उनका यह शब्दसागर अपने गौरव से कभी न गिरेगी, और इस क्षेत्र में वह नित नूतन प्रेरणादायक रहकर हिंदी का मानवर्धन करता रहेगा और उसका नया संस्करण और भी अधक प्रभओज्ज्वल होता रहेगा ।

नागरीप्रचारिणी सभा, काशी

सौर ३ पौच, सं. २०२२ वि. ।

सुधाकर पांडेय

प्रकाशन मंत्री

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